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	<description>Jharkhand Save The Forest Movement</description>
	<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:25:07 +0000</pubDate>
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		<title>वनमापन प्रशिक्षण : जंगल और जनता को बचाने के लिए जीपीएस का उपयोग हो</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:25:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[जेजेबीए द्वारा सराईकेला जिले के कुचाई प्रखण्ड अंतर्गत सोसोकड़ा गांव में जीपीएस मशीन से वन मापन का प्रशिक्षण चलाया गया। इस दौरान मुख्यतः तीन चीजों के बारे प्रशिक्षण दिया गयाः- जीपीएस, जीआईएस और पार्टिसिपेटरी 3-डी माॅडल। यह प्रशिक्षण 30 मार्च से 10 अप्रैल, 2010 तक चला जिसमें कुल 16 प्रतिनिधिनियों ने भाग लिया। ये प्रतिनिधि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जेजेबीए द्वारा सराईकेला जिले के कुचाई प्रखण्ड अंतर्गत सोसोकड़ा गांव में जीपीएस मशीन से वन मापन का प्रशिक्षण चलाया गया। इस दौरान मुख्यतः तीन चीजों के बारे प्रशिक्षण दिया गयाः- जीपीएस, जीआईएस और पार्टिसिपेटरी 3-डी माॅडल। यह प्रशिक्षण 30 मार्च से 10 अप्रैल, 2010 तक चला जिसमें कुल 16 प्रतिनिधिनियों ने भाग लिया। ये प्रतिनिधि जंगल पर जनता के अधिकार को लेकर काम करने वाले संगठनों से थे। पश्चिम बंगाल से राष्ट्रीय वन जन श्रम जीवि मंच, डिवोट ट्रस्ट, परिवर्तन, सेवा जगत (तीनों उड़ीसा), छत्तीसगढ़ से परिवर्तन और झारखण्ड से झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के प्रतिभागी शामिल हुए।<span id="more-159"></span><br />
	वन मापन प्रशिक्षण के दौरान रोज दिन फील्ड वर्क और जीपीएस प्रैक्टिस के बाद सैद्धांतिक क्लास भी होता था। इस दौरान प्रो. सबीनो पडीला और सुभाष दत्ता द्वारा वनमापन और जीपीएस के प्रयोग हेतु जरूरी बातों को बतलाते थे। इसमें वन मापन के तरीके और जीपीएस प्रयोग के तकनीक एवं नियम को समझाया जाता था। प्रो. सबीनो ने जीपीएस और जीआइएस के प्रयोग और उनके फायदे के बारे बतलया। जबकि दत्ता ने जंगल मापन के लिए जंगल को चार प्रकार का वर्गीकरण करते हुए घना जंगल, खुला जंगल, बेयर लैंड (खाली जगह या आवास या खेती जमीन) और प्लांटेशन (रोपे गये पेड़ या बगीचे) के बारे समझाया। जीपीएस को लेकर विभिन्न स्थानों से गुजरते समय महत्वपूण स्थानों और चीजों का मार्क प्वाइंट एवं नोट लेने के बारे उन्होंने बतलया। उन्होंने सर्वे के दौरान रिलेस्कोप के प्रयोग के बारे भी समझाया कि कैसे प्लोटिंग लिया जाता है, घना जंगल और खुला जंगल का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है तथा जंगल का क्षेत्रफल, घनत्व और पेड़ों की संख्या एवं प्रजाति कैसे निकाली जाती है।<br />
	30 मार्च को सभी प्रशिक्षणार्थी जेजेबीए आॅफिस रांची में एकत्रित हुए। उस दिन प्रशिक्षणार्थियों के बीच वन मापन के ऐतिहासिक पृष्टभूमि पर चर्चा की गई। इस दौरान जेजेबीए के संजय बसु मल्लिक ने बतलाया कि राज्यों के उदय के बाद ही पहली बार जमीन का नक्शा बनाने का काम शुरू हुआ। भारत में मुगल काल में अकबर के शासन के समय समुचित तरीके से नक्शा बनाने का काम शुरू हुआ। मुगलों ने जब झाड़खण्ड में जंगल का सर्वे और नापी किया तो उसमें उन्होंने खास तौर से सखुआ के पेड़ और हाथियों को दर्ज किया। राजाओं और सम्राटों ने संसाधनों के दोहन के लिए नक्शा बनाना शुरू किया। लेकिन गांव समुदाय को अपना नक्शा इसलिए बनाना चाहिए क्योंकि नक्शा एक ताकतवर औजार है। नक्शा अपने गांव की सीमा में उपलब्ध संसाधनों की सूचना एवं जानकारी देता है। अपना नक्शा होने से गांव के लोग अपने स्थानीय संसाधनों पर हक जता सकते हैं।<br />
	29 मार्च को ही रांची से खाने-पीने और सोने के सामानों- चावल-दाल, बर्तन, बाल्टी, कपड़े, गद्दे इत्यादि और प्रशिक्षण सामग्री को एक बोलेरो वैन में लाद कर प्रशिक्षण स्थल पहुंचाया गया था। 31 मार्च को 11 बजे सभी प्रतिभागी 2 गाड़ियों में सवार होकर कुचाई के लिए रवाना हुए और शाम के करीब 4 बजे रुगुदडीह पहुंचे जहां रहने-ठहरने की व्यवस्था थी। शाम को मीटिंग शुरू हुई जिसमें प्रतिभागियों का परिचय हुआ। इस दौरान रुगुदडीह के मुण्डा भागवत मुण्डा ने बतलाया कि इस क्षेत्र में 39 मौजा है जो मुण्डारी खुंटकट्टी है और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के तहत मुण्डाओं के कब्जे में है। उन्होंने इस प्रशिक्षण के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने के लिए आशीर्वाद दिया। इसके बाद मीटिंग में प्रशिक्षण के दौरान सुबह से शाम तक दैनिक रुटीन पर विचार किया गया।<br />
	वन मापन के इस प्रशिक्षण में विशेषज्ञ और स्रोत व्यक्ति के रूप में फिलीपीन्स से आये प्रो. सबीनो ने बतलाया कि जीपीएस से वन मापन प्रशिक्षण में कम से कम 12 दिन लग जाते हैं। इस अवधि में जीपीएस (ग्लोबल पोजिश्निंग सिस्टम), जीआईएस (ग्लोबल इन्फोर्मेशन सिस्टम), बेस मैप और पार्टिसिपेटरी 3-डी माॅडल के सिखलाया जाता है। उन्होंने बतलाया कि जीपीएस का उपयोग मिलिट्री या फौज और कंपनी द्वारा किया जाता रहा है, अब हमें जंगल और जनता को बचाने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए। सबीनो ने 3-डी माॅडल नक्शे के लिए आवश्यक सामग्रियों की सूची बतलाया। इसके बाद इन सारे सामानों को एक जगह एकत्रित किया गया; जैसे- कार्डबोर्ड, कटर, क्लिप, कार्बन कागज, माप टेप, गोंद, मार्कर, कैंची, प्लास्टिक टेप, धागा, पेन्सिल, पेन्टिग ब्रस, पेंट, रंग, पिन, बेस मैप, टेबल, हथौड़ा और रद्दी समाचारपत्र कागज। इस प्रशिक्षण के लिए 6 जीपीएस थे। इनमें दो तरह के जीपीएस- ओरिगोन-550 और गारमिन-12 थे। जीपीएस मोबाइल के आकार का एक ऐसा इलेक्ट्राॅनिक डिजिटल यंत्र है जिससे सर्वे करने और नक्शा बनाने का काम होता है। जीपीएस का पूरा नाम है ग्लोबल पोजिश्निंग सिस्टम। ग्लोबल पोजिश्निंग आक्षांश-देशांतर के आधार पर किसी स्थान विशेष की वास्तविक भौगोलिक अवस्थिति को बतलाता है और समुद्रतल से उंचाई को भी दर्शाता है।<br />
	1 अप्रैल को सुबह नास्ता के बाद सभी प्रतिभागी 8 बजे सोसोकड़ा गांव पहुंचे। गांव वालों ने दो खटिया निकाल दिया। अखड़ा के पास खटिया में सभी प्रतिभागी दो समूहों में बैठ गये। दोनों समूह के लिए दो-दो जीपीएस दिया गया। कोलकाता से आये सुभाष दत्ता और प्रो. सबीनो प्रशिक्षक के बतौर एक-एक समूह के साथ बैठ गये। सबसे पहले उन्होंने जीपीएस से परिचय कराया। जीपीएस को चालू करने और बंद करने तथा बैटरी लगाने के लिए सिखाया। उसके बाद जीपीएस को चालू करने के बाद उन्होंने अक्षांश-देशान्तर और ग्लोबल पोजिश्निंग के बारे बतलाया। फिर अलग-अलग मेनू में जाकर जीपीएस को आॅपरेट करने सिखाया। फिर उन्होंने ‘वे प्वाइंट’ और ‘मार्क प्वाइंट’ लेने के लिए सिखाया। प्रशिक्षणार्थियों ने इसका अभ्यास भी किया।<br />
	2 अप्रैल को गाड़ी में तेल भरने के लिए खरसवां गये थे। 3 अप्रैल को सोसोकड़ा गांव के जंगल के सर्वे के लिए सुबह 8 बजे नास्ता के बाद सोसोकड़ा गांव पहंुंचे। सर्वे करने की जिम्मेदारी सुभाष दत्ता को था। उनका स्पष्ट निर्देश था कि सर्वे टीम में वही व्यक्ति शामिल रहेंगे जो जंगल-झाड़ घूम सकते हैं, पहाड़ चढ़ सकते हैं। कठिन स्थिति को देखते हुए इसमें महिला प्रशिक्षणार्थी शामिल नहीं हुए। सर्वे टीम के प्रशिक्षणार्थी 10 बजे वहां के ग्रामीणों के साथ जंगल की ओर रवाना हुए। गांव के पूर्वी सिमाना से जीपीएस मशीन से ‘वे प्वाइंट’ लेकर बाउंडरी लाइन से होते हुए पहाड़ चढ़ना शुरू किये। कुछ लोग तो आधा दूरी तक पहाड़ चढ़कर वापस लौट गये। बाकी लोग कड़ी धूप और गर्मी में पसीने से तर होकर पहाड़ चढ़ते गये। पहाड़ की चोटी पर चढ़ने के बाद तिनसिमाना में ‘मार्क प्वाइंट’ लिया गया। इस पहाड़ की चोटी को सुरसी बुरू कहा जाता है जो 580 मीटर उंचाई पर है। वहां से आगे बढ़े। गांव के बुजुर्ग लोग अपने जंगल के बाउंडरी लाइन से होकर आगे-आगे चलते थे। उनके पीछे प्रशिक्षणार्थी जीपीएस मशीन को चालू करके हाथ में पकड़कर चलते जाते थे। दत्ता जी जंगल के घनत्व का अवलोकन करते हुए जगह-जगह पर जंगल के बीच घुसकर रिलेस्कोप मशीन से प्लोटिंग करते जाते थे। 12-1 बजे तक जंगल पहाड़ में घूमते हुए सभी कोई धूप की मार और प्यास से व्याकुल थे। बोतलों में भरे पानी भी पीते-पीते खत्म हो गया था। जंगल के दूसरे छोर पर पहुंचने पर एक झरने में उतरकर सभी ने ठंढा पानी पीया और बोतलों में पानी भरकर वहां से वापस सोसोकड़ा लौट गये। करीब साढ़े तीन बज गये थे। सभी कोई भूख-प्यास और थकान से चूर थे। सोसोकड़ा में भोजन करने के बाद सर्वे टीम रुगुडीह लौट गयी।<br />
4 अप्रैल को सोसोकड़ा से पश्चिम की ओर चले। उधर बीजार गांव का सिमाना पड़ता है। सोसोकड़ा और बीजार सीमाना अलग करने वाले पहाड़ों की तीन चोटियों पर चढ़ना पड़ा। इसमें कुटुबुरू 450 मीटर और किताबुरू की उंचाई समुद्र तल से 454 मीटर है। उस गांव की सीमा को निर्धारित करने वाले जंगलो-पहाड़ों से गुजरते हुए तीन बजे सोसोकड़ा वापस लौट गये। वहां भोजन करके रुगुडीह आ गये।<br />
5, 6 और 7 अप्रैल को 3-डी माॅडल नक्शा बनाकर तैयार किया गया। इसे कार्ड बोर्ड और कूट से बनाया गया। कूट के ऊपर कार्बन कागज और उसके ऊपर बेस मैप को रखकर पेन्सिल से निशान लगाया गया। उसके बाद कूट को कन्टूर के आधार पर काट-काटकर कार्डबोर्ड पर सांटा गया। फिर उसे अखबारी कागज से चिपकाकर पेंटिंग कर दिया गया। उस पर घना जंगल, खुला जंगल, नदी-नाला और पहाड़, गांव, खेत, सड़क, स्कूल, आंगनबाड़ी केन्द्र, अखड़ा, सरना, मसना, ससनदिरि, चापाकल, कुआं इत्यादि को अलग-अलग रंगों से दिखाया गया। इस तरह काफी मेहनत और लगन से 3-डी माॅडल बनकर तैयार हुआ। 8 अपैल को सोसोकड़ा मौजा गांव और सिगदा टोला का सर्वे हुआ जिसमें सरना, ससनदिरि, स्कूल, कुआं, चापाकल, तालाब, नदी-नाला इत्यादि का सर्वे किया गया। सिगदा टोले में प्रो. सबीनो, पुष्पा टोप्पो आदि गये हुए थे। 9 अप्रैल को सोसोकोड़ा के ग्रामीणों को बुलाकर 3-डी माॅडल को  दिखलाया गया और साथ प्रतिभागियों का सामुहिक फोटोग्राफी किया गया।<br />
10 अप्रैल को सभी रांची वापस लौट गये। 11 से 14 अप्रैल जेजेबीए आॅफिस रांची में प्रो. सबीनो ने ग्लोबल मैपर, जीआइएस, आर्कव्यू आदि सोप्टवेयर के माध्यम से डाटा प्रोसेसिंग करके कंप्यूटर से नक्शा तैयार करने के बारे प्रशिक्षण दिया। अंत में सभी प्रशिक्षणार्थियों को आईसीएफजी की ओर से वन मापन टेªनिंग का प्रमाण-पत्र दिया गया गया। प्रशिक्षण मंे संजय बसु मल्लिक, जेवियर कुजूर, पुष्पा टोप्पो, सूर्यमनी भगत, विजय भगत, जेवियर हमसाय, हेमंत मिंज, प्रदीप बिलुंग, सनिका टूटी, अमिता टूटी, सोहन लाल, सरत पात्रा, विष्णु मांझी, प्रसन्न दास, रमाकांत रावत और सौरभ ने भाग लिया। प्रशिक्षण तो सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया, किन्तु उसके बाद उनमें से 10 साथी बे्रन मलेरिया से पीड़ित हो गये थे। सभी को हाॅस्पिटल में भर्ती कर इलाज कराया गया।</p>
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		<title>संताल आदिवासियों के बीच जनसभा</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:23:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[झाड़खण्ड जंगल बचाओ आंदोलन की ओर से गिरिडीह जिला के देउरी प्रखण्ड के फुटका गाँव में संताल आदिवासियों के बीच एक जनसभा हुई। इस दौरान जेजेबीए के प्रभारियों ने वनाधिकार कानून 2006 और उसे लागू करने की प्रक्रिया के बार विस्तारपूर्वक जानकारी दी। ग्रामीणों को ग्रामसभा और वनााधिकार समिति गठन कर वनभूमि के दावेदारों को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>झाड़खण्ड जंगल बचाओ आंदोलन की ओर से गिरिडीह जिला के देउरी प्रखण्ड के फुटका गाँव में संताल आदिवासियों के बीच एक जनसभा हुई। इस दौरान जेजेबीए के प्रभारियों ने वनाधिकार कानून 2006 और उसे लागू करने की प्रक्रिया के बार विस्तारपूर्वक जानकारी दी। <span id="more-157"></span>ग्रामीणों को ग्रामसभा और वनााधिकार समिति गठन कर वनभूमि के दावेदारों को अपना दावापत्र वनााधिकार समिति के पास जमा करने का सुझााव दिया गया। सभा में 10 गाँव के करीब 500 लोग उपस्थित थे जिसमें महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। सभा में सावन हंसदा, शैली मुर्मू, सुमित्रा मुर्मू, संतोष बास्के, राधाकृष्ण, राजेश, पौलुस, पुष्पा और जेवियर ने अपने विचार रखे।</p>
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		<title>एफडीए फंड से वनाधिकार आंदोलन को तोड़ने का प्रयास : राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच की क्षेत्रीय बैठक</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:22:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[25 जून, 2010 को रांची के एचआरडीसी सभागार में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच के तत्वावधान में पूर्वी क्षेत्रीय मीटिंग आयोजित की गई। इसमें पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और उड़ीसा के 21 प्रतिभागी भाग लिये। बैठक में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की वर्तमान स्थिति और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>25 जून, 2010 को रांची के एचआरडीसी सभागार में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच के तत्वावधान में पूर्वी क्षेत्रीय मीटिंग आयोजित की गई। इसमें पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और उड़ीसा के 21 प्रतिभागी भाग लिये। बैठक में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की वर्तमान स्थिति और भावी कार्यक्रमों पर चर्चा हुई। <span id="more-155"></span><br />
	मंच के क्षेत्रीय समिति के संयोजक जेवियर कुजूर ने पिछले राष्ट्रीय मीटिंग की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि पिछले जनवरी में हुए मीटिंग में वनाधिकार कानून को पूरे देश में लागू कराने और सामुदायिक वन पालन को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का निर्णय था। साथ ही जलवायु परिवर्तन और वनों के बाजारीकरण को रोकने तथा जन आन्दोलन पर पुलिस व सैन्य दमन को रोकने का भी निर्णय लिया गया था।<br />
	रिपोर्टिंग के बाद दिल्ली से आयी राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच की ममता दास ने मंच के क्षेत्रीय कमेटी के गठन के उद्देश्यों को बतलया जो निम्नलिखित हैं:- 1. पूर्वी भारत के चार राज्यों असम, बंगाल, झाड़खण्ड और उड़ीसा में आपसी तालमेल और समन्वय अच्छा बने; 2. वनाधिकार को लागू करने में इन राज्यों के संगठन एक-दूसरे को मदद कर सकें; 3. चारों राज्यों के वनाधिकार आन्दोलन में एक नेटवर्क बने; 4. चारों राज्यों के आन्दोलन के बारे में एक-दूसरे को खबर हो; 5. राष्ट्रीय स्तर के आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका हो और इन राज्यों के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उभरे; और 6. व्यपाक राष्ट्रीय स्तर के आन्दोलन के लिए क्षेत्रीय समितियों को मजबूत करना।<br />
	इसके बाद प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में वनाधिकार कानून को लागू करने के संबंध में जानकारियों को साझा किया। इस दौरान उत्तर बंगाल के शंकर क्षेत्री ने बतलाया कि इस वर्ष जलपाईगुड़ी जिले के कोदालबस्ती चिलापाटा फोरेस्ट में जंगल पर सामुदायिक अधिकार को लागू करने के लिए ग्राम सभा द्वारा साइनबोर्ड लगाये थे, लेकिन पुलिस उसे उखाड़कर ले गयी और पुलिस ने गांव के कुछ लोगों पर केस भी कर दिया है। वन श्रमजीवी मंच के लोगों ने उनका जमानत करा लिया है। इस घटना के समय से महिलाएं और बच्चे भी संघर्ष के साथ जुड़े हैं। गोरखा जन मुक्ति आन्दोलन के चलते हमें काम करने में मुश्किल हो रहा है। आदिवासी अधिकार मंच की झरना आचार्य ने बतलाया कि सरकारी आधार पर प. बंगाल में अब तक 22 हजार लोगों को पट्टा मिला है, जबकि 1 लाख 42 हजार 782 दावा-पत्र जमा हुए थे। लोधा समुदाय के लोगों को जो पट्टा मिला, उनमें अधिकतर को 22 डिसमिल जमीन मिला। उन्होंने बतलया कि दक्षिण बंगाल में ग्रीन हंट आॅपरेशन के कारण लोग गांव से भाग गये हैं। अतः वनाधिकार को लेकर उनकी मीटिंग करने में दिक्कत हो रहा है। अभी क्षेत्र के 7 गावों में सामुदायिक दावा-पत्र भरने का निर्णय लिया गया है। साथ ही सामुदायिक वन संसाधन का साईनबोर्ड लगाने का निर्णय है। वनाधिकार को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दर्ज की गई है। गोविंद रोका ने कहा कि वन विभाग एफडीए फंड देकर आन्दोलन को कमजोर कर रहा है, उसे रोका चाहिए।<br />
	जंगल सुरक्षा महासंघ, उड़ीसा के कैलाशचंद्र साहू ने बतलया कि राज्य के ग्यारह जिले के 245 गांवों ने सामुदायिक वन अधिकार का दावा-पत्र पेश किया है। नोयागड़ा जिले में 1956 से ही समुदाय की पहल से जंगल सुरक्षा शुरू हुआ और 1970 में इसमें तेजी आयी। इसमें सरकार की पहल नहीं थी। लेकिन अभी वन विभाग के लोग अपने द्वारा गठित वन सुरक्षा समिति को फोरेस्ट डेवलोपमेंट एजेंसी द्वारा फंड देकर संयुक्त वन प्रबंधन को ही लागू करने में लगे हैं। उन्होंने बतलाया कि सरकार सामुदायिक वन प्रबंधन को मान्यता नहीं दे रही है। अभी उड़ीसा में 12-15 गांवों में वनप्रबंधन का काम चल रहा है तथा उड़ीसा जंगल मंच के नाम से एक राजस्तरीय मंच भी बना है। झाड़खण्ड के प्रतिनिधियों ने बतलया कि सरकारी आंकड़ा के मुताबिक राज्य में अब तक करीब 4 हजार लोगांे को पट्टा मिला जबकि 27 हजार दावा-पत्र जमा हुए।<br />
बैठक में निम्न प्रस्ताव लिये गयेः-<br />
1. समुचित तरीके से सामुदायिक दावा-पत्र भरकर जमा करना;<br />
2. सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन हेतु जंगल में साइनबोर्ड लगाना;<br />
3. वनाधिकार के क्रियान्वयन से संबंधित केस स्टडी और जमीनी स्तर के आंकड़ों का दस्तावेजीकरण करना ताकि वन विभाग पर मुकदमा और कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज किया जा सके, और<br />
4. जरूरी दस्तावेज, पुस्तिका और पोस्टर छापकर जनता तक पहुंचाना।</p>
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		<title>शिक्षा के अधिकार पर दो दिवसीय कार्यशाला</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:20:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[News]]></category>

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		<description><![CDATA[सबको शिक्षा समान शिक्षा: क्या हमारे राज्य में खरा उतर पायेगा
रांची स्थित गोसनर कम्पाउड एच.आर.डी.सी में 11 - 12 जून 2010 को प्रखण्ड प्रभारियों के नेतृत्व क्षमता को बढ़ाने के लिए शिक्षा अधिकार कानून 2009 पर दो दिवसीय कार्यशाला किया गया। 
	इस कार्यशाला में खासतौर पर 1 से 18 वर्ष तक के बच्चों के शिक्षा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सबको शिक्षा समान शिक्षा: क्या हमारे राज्य में खरा उतर पायेगा<br />
रांची स्थित गोसनर कम्पाउड एच.आर.डी.सी में 11 - 12 जून 2010 को प्रखण्ड प्रभारियों के नेतृत्व क्षमता को बढ़ाने के लिए शिक्षा अधिकार कानून 2009 पर दो दिवसीय कार्यशाला किया गया। <span id="more-153"></span><br />
	इस कार्यशाला में खासतौर पर 1 से 18 वर्ष तक के बच्चों के शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उनके शिक्षाधिकार पर मंथन किया गया। एक बात सामने निकलकर आयी कि शिक्षा को बाजार में बेचा जा रहा है अर्थात् शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया गया। एक तरफ सरकार सबको शिक्षा समान शिक्षा कह कर गरीब बच्चों को शिक्षित और साक्षर बनाने का आश्वसन देती है, लेकिन दूसरी तरफ इसके प्रबंधन के लिए सरकार निजी संस्थाओं को सौपी जा रही है। 26 अगस्त 2009 को देश के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार बना। इसमें 06 से 14 वर्ष के बच्चों को अधकार मिलेगा। सवाल  है कि 14 वर्ष के ऊपर के बच्चों को अधिकार की बात क्यों नहीं?<br />
	झारखण्ड में गांव, शहर या कस्बों से इतना दूर है कि स्कूल बच्चों के पहुंच से दूर है। निजी स्कूलों में तो निर्धन बच्चे पढ़ नहीं पाते चूंकि वहां फीस ज्यादा देना पढ़ता है। जिन गांवों में सरकारी स्कूल है, निःशुल्क शिक्षा मिल सकता है वहां बच्चे बहुत ज्यादा (100) और शिक्षक 1 या 2 ही हैं तो उस स्कूल का पढ़ाई किस तरह का होगा। अगर दूर के अच्छे स्कूलों में जाना भी चाहते हैं तो आने-जाने के लिए साधन नहीं। बच्चे पढ़ेगे कैसे? इसलिए सरकार को चाहिए कि बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को सुदृढ़ करें, चूंकि भविष्य में राज्य और देश का विकास उन्हीं बच्चों पर निर्भर करता है।<br />
	स्कूली और पारंपरिक शिक्षा पर भी चर्चा हुई। इस चर्चा के दौरान कुछ बातें सामने आई- स्कूली शिक्षा में बच्चों को केवल पुस्तकीय ज्ञान ही हासिल होगा। हमारे बच्चों को परंपारिक ज्ञान का मिलना भी निहायत जरुरी है। आज हम अपने भाषा-संस्कृति, परंपारिक ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं। हम अपने इतिहास को नहीं जानते हैं। इन सारे अमूल्य रत्नों को बचाना बहुत जरुरी है, और इनको बचाने के लिए इन्हें पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराना होगा ताकि हमारे बच्चे अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान, इतिहास को जाने।<br />
	शिक्षा अधिकार पर नये-नये कानून बनाये गए और बीच-बीच में संशोधन भी हो रहा है। किन्तु इन कानूनों को जमीनीस्तर पर लागू नहीं किया गया। इसकी भी लड़ाई हम वर्षों से करते आ रहे हैं। ऐसे तो झारखण्डी अपने झारखण्ड के लिए सदियों से लड़ाई लड़ते आ रहे हैं और अभी भी जारी है। हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हमें अपने इच्छानुसार रहने नहीं दिया जाता। किन्तु अत्याधिक निर्धन बच्चों को अच्छा शिक्षा कैसा मिलेगा, क्योंकि कानून में प्रदत्त प्रावधान  एवं अधिकार भी उन्हें सही से मिल नहीं पाता है, कहीं-कहीं तो शून्य है। अतः  हमें ठोस कदम उठाना होगा, सरकार को ज्ञापन देना होगा। झारखण्ड की शिक्षा नीति में बदलाव लाने और शिक्षा के बजारीकरण को नियंत्रित करने के लिए सरकार पर दबाव डालना होगा।<br />
शिक्षा का अधिकार कानून के आधार परः-<br />
	1. 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा।<br />
	2. निजी स्कूलों को 25 फीसदी स्थान गरीब और वंचित तबके के लिए आरक्षित रखेंगे।<br />
	3. शारीरिक और मानसिक विकलांग बच्चों को भी शिक्षा का पूरा अधिकार।<br />
	4. 30 बच्चों पर एक शिक्षक का अनुपात।<br />
	5. 5 वर्ष के भीतर निजी स्कूलों के सभी शिक्षकों को प्रशिक्षण लेना होगा।<br />
	6. सर्वेक्षण से पता लगाना होगा कि कौन से बच्चे स्कूल से बाहर हैं।<br />
	7. स्कूलों के ढांचे (पीने का पानी, शौचालय, स्वच्छता आदि) को दुरुस्त करना होगा।<br />
	8. स्कूलों में बच्चों को किसी भी तरह की सजा नहीं दी जा सकेगी।<br />
इस कानून को लागू करने पर पांच सालों में 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। पहले ही साल इसके लिए 34 हजार करोड़ रुपये की जरुरत है, पर भारत सरकार ने केवल 15 हजार करोड़ रुपये का ही आवंटन किया है। तो क्या सबको शिक्षा और समान शिक्षा वाली बात देश या राज्य में खरा उतर पायेगा?<br />
	दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्यतः क्राई के श्री साईबाल बोरोई, प्रो. संजय बसु मल्लिक, सुश्री पुष्पा टोप्पो, जनमाध्यम से श्री फैसल अनुराग, प्रवीण कुमार और जेजेबीए के करीब 50 प्रखण्ड प्रभारीगण प्रतिभागी के रुप में उपस्थित थे।</p>
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		<title>जनजातीय विकास एवं वन अधिकार अधिनियम : राज्य स्तरीय कार्यशाला</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Jul 2010 12:18:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[News]]></category>

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		<description><![CDATA[झाड़खण्ड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में 28 जून, 2008 को कल्याण विभाग, झाड़खण्ड सरकार की ओर से “जनजातीय विकास एवं वन अधिकार अधिनियम” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का अयोजन किया गया। इस कार्यशाला में जेजेबीए के करीब 60 कार्यकर्ता भाग लिये। 
	संस्थान के उपनिदेशक श्री सोमा मुण्डा ने कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>झाड़खण्ड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में 28 जून, 2008 को कल्याण विभाग, झाड़खण्ड सरकार की ओर से “जनजातीय विकास एवं वन अधिकार अधिनियम” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का अयोजन किया गया। इस कार्यशाला में जेजेबीए के करीब 60 कार्यकर्ता भाग लिये। <span id="more-151"></span><br />
	संस्थान के उपनिदेशक श्री सोमा मुण्डा ने कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि लोगों को इस अधिनियम और इसके अधिकार के बारे में जानकारी हो। सरकारी संस्थान और गैर सरकारी संस्थान एक लक्ष्य के लिए एक साथ मिलकर काम करेंगे तो हमारा लक्ष्य जरूर पूरा होगा। यह अधिनियम किसी को लड़ाने के लिए नहीं बनी है, बल्कि समस्याओं के समाधान के लिए बनी है। इस अधिनियम में वन निवासियों की भी भूमिका है, अधिकार के साथ कत्र्तव्य भी हैं।<br />
	रांची के उपायुक्त के. के. सोन ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि विगत कुछ वर्षों में सामाजिक मुद्दों पर भार सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण कानून बनाये हैं- नरेगा, वनाधिकार, सूचनाधिकार इत्यादि। ये कानून सामाजिक आन्दोलन के परिणाम हैं। इन कानूनों को बनाने में कई संगठनों की भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि जब वनाधिकार कानून को लागू करने के लिये नियमावली बन रहा था तो उन्होंने आदिवासी कल्याण आयुक्त पद पर रहते हुए राज्य के सभी जिले के उपायुक्तों को इस कानून को लागू करने का नोटिस भेजा था। उन्होंने कहा कि जनवरी 2008 में जब से यह कानून लागू हुआ, तब से अब तक हमने इसे लागू करने के लिए जो काम किया या करने की कोशिश कर रहे हैं, उस पर विचार हो तथा इस तरह के कार्यशाला को निचले स्तर तक ले जाने की जरूरत है। इसके लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए। उन्होंने रांची में मात्र 700 दावा-पत्र जमा होेने पर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि रांची जिले में वनाधिकार कानून के मामले में जिला कल्याण पदाधिकारी को अधिकृत किया गया है। उन्होंने आश्वसन दिया कि वे वनाधिकार कानून पर सहयोग करेंगे। इसको लेकर रांची में हर महीने बैठक होगी। वन विभाग भी अब वनाधिकार को लागू करने में आएगा। उन्होंने कहा कि एग्रोफोरेस्टरी को बढ़ावा देना होगा। इसके तहत उनकी ओर से पेड़ लगाने से लेकर पटवन और पेड़ों की सुरक्षा तक के लिए पैसे दिये जा रहे हैं। उन्होंने यह भी बतलाया कि धारा-230 के तहत वन निवासियों के छोटे-मोटे मुकदमे वापस करने हेतु उपायुक्त को अधिकृत किया गया है।<br />
	प्रो. संजय बसु मल्लिक ने कहा कि पिछले 60 साल में वन विभाग ने झाड़खण्ड के जंगल को उजाड़ दिया। पिछले 60 सालों आदिवासी क्षेत्र में पंचशील का उल्लंघन ही हुआ तो विकास कैसे होगा? विकास के नाम पर उनका विस्थापन ही हुआ। संसांधनों पर आदिवासियों के अधिकार के बिना उनका विकास कैसे होगा? वनाधिकार कानून में दावेदारों को 10 एकड़ जमीन देने की बात है लेकिन 30-40 डिसमिल ही दिया जा रहा है। क्या इससे किसी परिवार का पेट भरेगा? इतना जमीन लेकर वह क्या करेगा? उन्होंने बतलाया कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध के कारण लकड़ी की मांग बढ़ने पर जमींदारों ने धड़ल्ले से जंगल काटकर लकड़ी बेचा। इस वन कटाई को रोकने के लिए ही अंग्रेजों ने बिहार वन अधिनियम बनाया था।<br />
	इज्जत से जीने का अभियान से जुड़े जोर्ज मनीपली ने कहा कि वनाधिकार कानून को लागू करने में झाड़खण्ड और अन्य राज्यों की स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं है। कुछ राज्यों में दावा-पत्र अधिक जरूर जमा किये गये हैं लेकिन 25 प्रतिशत लोगों को ही पट्टा मिला। उन्हें भी औसतन 25-30 डिसमिल ही हर परिवार को जमीन मिला। वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की समस्या पर उन्होंने कहा कि प्रशासन तंत्र के लोग इस कानून को लागू करने में ग्रामसभा को अधिकारी मानने को तैयार नहीं हैं। कही-कहीं गांव के लोग भी वन अधिकार समिति और ग्रामसभा पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। वे 50 से 100 रू. देकर प्रखण्ड कार्यालय में जाकर किसी चपरासी के पास अपना दावा-पत्र जमा करते हैं, लेकिन ग्रामसभा या वन अधिकार समिति के जमा करने में सोचते हैं। दूसरी बात है कि सरकार द्वार निर्मित दावा-पत्र जटिल है जिसे गांव वाले आम आदमी नहीं भर सकते। जो लोग किसी तरह दावा-पत्र भरकर ब्लाॅक आॅफिस में जमा करने जा रहे हैं, तो वहां के कर्मचारी दावा-पत्र जमा करने के लिए 400 रु. की मांग कर रहे हैं तथा पट्टा मिलने पर और 5 हजार रु. की मांग कर रहे हैं। उधर वन विभाग को अब यह लग रहा है कि आने वाले दिन जंगल से हमारा अधिकार जाने वाला है। वन विभाग के रवैये को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह कानून ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए बना है, पर ऐतिहासिक अन्याय को बरकरार रखने का प्रयास हो रहा है। सभी जिलों के उपायुक्तों को वनाधिकार कानून को लागू करने हेतु निर्देश देना था, पर कई जिलों में यह नहीं हो रहा है।<br />
	जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक डाॅ. प्रकाश उरांव बतलया कि झारखण्ड में अब तक कुल 30 हजार 16 दावा-पत्र जमा हुए जिसमें से 6 हजार 607 लोगों को पट्टा वितरण किया गया है। पूर्व आईएएस वाई. बी. प्रसाद ने कहा कि 10 दिन पहले भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है जिसमें ग्राम सभा में वनाधिकार समिति से वन विभाग को अलग रखा है। उन्होंने कहा कि वनाधिकार कानून की जानकारी बहुत कम लोगों को है। उन्होंने यह भी बतलाया कि अभी रिपोर्ट है कि जहां-जहां माओवाद है वहां जंगल कटाई रुका है तथा उन क्षेत्रों से लकड़ी व्यापार के ठेकेदार और दलाल भाग गये हैं। वन विभाग के सहायक सचिव आर. के. चैधरी ने कहा कि पहले के वन कानून या नीति और अभी के वनाधिकार कानून में कई विरोधाभास नजर आएंगे। राज्य में वनाधिकार कानून का क्रियान्चयन प्रारंभिक चरण है, धीरे-धीरे काम बढ़ेगा और उद्देश्य पूरा होगा।<br />
	राज्य सभा सांसद डाॅ. रामदयाल मुण्डा ने कहा कि इस कानून को पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में लागू करने में वांक्षित शक्ति नहीं है, ऐसा एक विचार है। आदिवासी मंत्रालय को इस कानून को लागू करने में नोडल एजेंसी बनाया गया है लेकिन यह मंत्रालय अभी नया गठित होने के कारण उसके सामने कठिनाई है। उन्होंने कहा कि वनाधिकार को लागू करने में जो आशंकाएं हैं, उनका निराकरण हो। कुछ लोगों को आशंका है कि आदिवासियों को जब जंगल पर अधिकार मिलेगा तो जंगल का हाल बेहाल हो जाएगा, जंगल क्षरण होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि वनाधिकार कानून के लागू होने से वन विभाग और वन निवासियों के बीच जो अविश्वास है, वह दूर होगा। कार्यशाला में प्रतिभागियों को चार गु्रप में बांटकर गु्रप चर्चा कराया गया जिसमें निम्न विषय थेः- 1. वन विभाग और वन निवासियों की भूमिका; 2. आजादी के 62 वर्ष बाद वननीति से क्या पाया, क्या खोया; 3. वनाधिकार कानून से जनजातीय विकास और लाभ; और 4. लघु वनोपज और जनजाति। इनपर ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति भी की गई। अंत में संस्थान के निदशक ने कहा कि कार्यशाला और ग्रुप चर्चा से उभरे बातों को वे सरकार को भेजेंगे।</p>
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		<title>फिलीपीन्स की महिलाओं ने किया झारखण्ड में आदिवासी नेतृत्व प्रशिक्षण का मूल्यांकन</title>
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		<pubDate>Sat, 29 May 2010 10:48:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[- जेवियर कुजूर -
वर्ष 2009 में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में बिन्द्राई इन्सटीट्यूट फाॅर रिसर्च स्टडी एंड एक्शन ‘बिरसा’ की ओर से आदिवासी सामुदायिक संगठनकों एवं नेतृत्वकर्ताओं के लिए कुल 8 प्रशिक्षण कार्यशाला चलाये गये थे। इसी के मूल्यांकन के सिलसिले में फिलीपीन्स से जोआन कार्लिंग और जॉन वेलीनेबा झारखण्ड आयी हुई थीं। वे 13 [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>- जेवियर कुजूर -</strong><br />
वर्ष 2009 में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में बिन्द्राई इन्सटीट्यूट फाॅर रिसर्च स्टडी एंड एक्शन ‘बिरसा’ की ओर से आदिवासी सामुदायिक संगठनकों एवं नेतृत्वकर्ताओं के लिए कुल 8 प्रशिक्षण कार्यशाला चलाये गये थे। इसी के मूल्यांकन के सिलसिले में फिलीपीन्स से जोआन कार्लिंग और जॉन वेलीनेबा झारखण्ड आयी हुई थीं।<span id="more-148"></span> वे 13 फरवरी को 6.30 रांची पहुंचने के बाद 11.30 बजे बुड़मू के कोटोरी गांव पहुंचे और मूल्यांकन बैठक में शामिल हुए जो शाम 5 बजे तक चला। टीम में झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के संजय बसु मल्लिक, जेवियर कुजूर और राधाकृष्ण सिंह मुण्डा शामिल थे।   </p>
<p>	कोटारी स्थित जंगल बचाओ आन्दोलन के आॅफिस के प्रांगण में बाल अखड़ा के सदस्यों ने गीत और मांदर की थाप के साथ फूलगुच्छे देकर जोआन कार्लिंग और जाॅ का स्वागत किया। उसके बाद वहां स्थित हाॅल में मूल्यांकन बैठक शुरू हुई। सबसे पहले फिलीपीनो महिलाओं ने अपना परिचय और झारखण्ड आने के अपने उद्देश्यों को बतलाया। जोआन कार्लिंग ने बतलया कि वह फिलीपीन्स के कोर्डिलेरा से है और 20 सालों से आन्दोलनकारी है। वर्ष 2008 में वह महासचिव के पदभार के साथ एआईपीपी से जुड़ी। एआईपीपी का मुख्य उद्देश्य है आदिवासी ज्ञान एवं अधिकारों के लिए संघर्ष और मानवाधिकार हेतु अभियान चलाना।</p>
<p><strong>मूल्यांकन चर्चा के दौरान प्रतिभागियों से जॉन ने मुख्य रूप से छः सवाल पूछेः-</strong></p>
<ul>
<li>1. आपके मुद्दे और संघर्ष क्या हैं?</li>
<li>2. आदिवासी सामुदायिक संगठनकों एवं नेतृत्वकर्ताओं के प्रशिक्षण कार्यशाला से आपको क्या अनुभव हुआ?</li>
<li>3. कार्यशाला में आपने क्या सीखा और सीखने के बाद आप अपने क्षे़त्र में क्या कर रहे हैं? </li>
<li>4. क्या इस प्रशिक्षण से आप नेतृत्व के लिए सक्षम हो पाये हैं? </li>
<li>5. कार्यशला में क्या कमी थी? </li>
<li>6. प्रशिक्षण को बेहतर बनाने के लिए आपका सुझाव क्या है?</li>
</ul>
<p> इन सवालों का जवाब प्रशिक्षण प्राप्त सभी प्रतिभागियों ने एक-एक करके दिया जो संतोषजनक रहा। मूल्यांकन के दौरान विस्थापन, पलायन, वनाधिकार कानून, नरेगा, जंगल बचाओ आन्दोलन इत्यादि पर चर्चा हुई। विनय उरांव ने टाना आन्दोलन की चर्चा करते कहा कि झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है। मूल्यांकन बैठक में उपस्थित 24 लोगों में से 11 प्रशिक्षणप्राप्त प्रतिभागी आये थे। कोटारी में आदिवासी सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं का पहला प्रशिक्षण हुआ था जिसमें चान्हो, बुड़मू, चंदवा और बालूमाथ और कांके प्रखण्ड के करीब 35 प्रतिभागी शामिल थे।</p>
<p>	14 फरवरी को यह टीम चाईबासा पहुंची। रास्ते में ये तोरपा के एनएचपीसी के अतिथिशाला परिसर में मुण्डा पड़हा की बैठक में भी शामिल हुए जहां मुण्डा पड़हा अपने परंपरागत स्वशासन और समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा के सवाल पर जुटे थे। 15 फरवरी को गुइरा स्थित टीआरटीसी में पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला-खरसवां और जमशेदपर से पहंुचे प्रतिभागियों के बीच मूल्यांकन बैठक हुई। इस दौरान अर्जुन समद ने तुरामडीह में यूरेनियम खदान से होने वाले विस्थापन और प्रदूषण की चर्चा करते हुए बतलाया कि 1967 में स्थापित यूसीआईएल के तहत अभी 6 परियोजनाएं चल रही हैं। यहां के विस्थापतों का पुनर्वास नहीं हो पाया है, सिर्फ 5 प्रतिशत लोगों को मुआवजा मिला है। कंपनी द्वारा श्रम कानून का उल्लंघन भी किया जाता है। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती, उल्टे आन्दोलन करने वाले समूहों पर कंपनी द्वारा आरोप लगाया जाता है कि इनका संबंध अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से है। स्थानीय युवा वर्ग इस आन्दोलन में है। इससे कचरा फेंकने के लिए टेलिंग पोंड के लिए भूमि अधिग्रहण और क्षेत्र में जंगल कटाई पर रोक लगी है। कंपनी मंे होने वाले नियुक्तियों के मामले में अनियमितता को भंडाफोड़ करने लिए ये युवा सूचना अधिकार कानून को काम में ला रहे हैं। </p>
<p>उधर नेतृत्व प्रशिक्षण के बाद महिलाएं भी और सक्रिय हुई हैं। वे रिपोर्टिंग, दस्तावेजीकरण और आॅफिस कार्याें को बेहतर ढंग से कर रही हैं। सरायकेला के जीतमनी टुडू ने बतलाया कि महिलाओं ने संगठित होकर जुपीटर सीमेंट फैक्टरी को बंद कराया। राजनगर प्रखण्ड अंतर्गत प्रस्तावित डैम निर्माण के विरुद्ध ग्रामीणों को जागरुक कर रही हैं। वे विस्थापन और महिला हिंसा के खिलाफ तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे मुद्दों पर जागरूक हुई हैं। मूल्यांकन के दौरान प्रतिभागियों ने बतलाया कि प्रशिक्षण से संगठन की समझ और संगठन चलाने, संगठन से लोगों को जोड़ने, संगठन के आय-व्यय का रख-रखरखाव, जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के हक, नेतृत्व कला एवं गुण, महिला नेतृत्व, आत्मविश्वास इत्यादि सीख मिली। इस दौरान एतवारी नाग, श्याम सुंडी, मनोज तिरिया, विक्टोरिया कुजूर, सत्य देवगम, रसिका, समित्रा तियु, सिद्धार्थ और गीता गागराई ने भी अपनी बातों को रखा। इन बातांे को मूल्यांकनकर्ताओं ने उत्साहनजनक कहा। बाद में उन्होंने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कमेटी के सदस्यों के साथ चर्चा कर ‘बिरसा’ के पांचों यूनिट की पृष्टभूमि, कार्यक्रम और चुनौतियों के बारे भी जानकारी ली।   </p>
<p>	16 फरवरी को चाईबासा स्थित बिरसा जोहार आॅफिस में उनके स्टाफ सदस्यों के साथ बैठक हुई। इस दौरान ‘जोहार’ के सचिव रमेश जेराई ने ‘बिरसा’ की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और और वर्तमान कार्यक्रम और संगठनिक ढांचा के बारे विस्तार से जानकारी दी। फिर नेतृत्व प्रशिक्षण के समन्वयक की हैसियत से उन्होंने इसका मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि इससे झारखंड में विभिन्न आदिवासी संगठनों, आन्दोलनों के प्रतिनिधियों और नेतृत्वकर्ताओं से सम्पर्क एवं संबंध बढ़ा है। फिलीपीन्स की महिलाओं ने चाईबासा से लौटने के क्रम में निकट के गुन्टिया गांव का भ्रमण किया और वहां के महिलाओं से बातचीत की। महिलाओं ने बतलाया कि उन्होंने संगठित होकर वहां आने वाली कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण को रोक दिया है।                        </p>
<p>	आदिवासी सामुदायिक नेतृत्व प्रशिक्षण के तहत झारखण्ड में बुड़मू (रांची), हजारीबाग, महुंआडांड़ (लातेहार), चाईबासा, खूंटी, सरायकेला, दुमका और जमशेदपुर में ये कार्यशाला किये गये। यह कार्यक्रम एशिया इंडीजिनस पीपुल्स पैक्ट के सहयोग से किया गया। इन कार्यशालाओं में खास तौर से वैसे लोगों को प्रतिभागी के तौर पर चयन किया गया था जो सामुदायिक स्तर पर आदिवासी मुद्दों, जन आन्दोलनों, ग्राम सभा आन्दोलन इत्यादि से जुड़े हैं और किसी न किसी स्तर में अपने गांव, समुदाय या क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं। इन कार्यशालाओं में प्रतिभागियों की निर्धारित संख्या 20 रखी गई थी, पर कहीं-कहीं यह संख्या 30 से 35 भी थी। कोशिश यह भी थी कि इनमें महिला और पुरुष प्रतिभागियों की संख्या बराबर हो। इक्के-दुक्के कार्यशाला को छोड़ बाकी सभी कार्यशालाओं में महिला-पुरुष की भागीदारी समान रही। पूरे कार्यक्रम को संचालित करने के लिए एक प्रबंधन समिति बनी है जिसमें रमेश जेराई, जेवियर कुजूर और विनीत मुंडू हैं। इस कार्यक्रम को आगे भी करने का विचार है।</p>
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		<title>वनभूमि को बेचने से दलालों और ग्रामीणों के बीच तनाव, हिंसा की आशंका</title>
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		<pubDate>Sat, 29 May 2010 10:45:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[News]]></category>

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		<description><![CDATA[- प्रमिला उरांव -
यह एक विडम्बना ही है कि वनाधिकार कानून 2006 बनने के बाद भी वनभूमि पर महाजनों और कंपनियों का कब्जा हो रहा है। एक ओर वनभूमि के असल दावेदारों को उनके परंपरागत और कानूनी अधिकारों से वंचित करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर वनविभाग द्वारा वनभूमि को महाजनों-कंपनियों के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>- प्रमिला उरांव -</strong><br />
यह एक विडम्बना ही है कि वनाधिकार कानून 2006 बनने के बाद भी वनभूमि पर महाजनों और कंपनियों का कब्जा हो रहा है। एक ओर वनभूमि के असल दावेदारों को उनके परंपरागत और कानूनी अधिकारों से वंचित करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर वनविभाग द्वारा वनभूमि को महाजनों-कंपनियों के हाथों बेची जा रही है। <span id="more-146"></span>ऐसी ही एक घटना है नउदी गांव की जहां करीब एक हेक्टेयर वनभूमि को वनविभाग और दलालों ने मिलकर महाजनों को बेच दिया है। ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं। मामले को लेकर ग्रामीणों और दलालों के बीच तनाव फैल गया है। कभी भी हिंसक घटना हो सकती है। ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।</p>
<p>	नउदी गांव रांची जिले के चान्हो प्रखण्ड अंतर्गत रांची से करीब 40 कि.मी. की दूरी पर है। यह शहीद बीर बुधु भगत के गांव के नजदीक का ही एक गांव है। इस गांव के लोग पिछले 7 सालों से जंगल रक्षा करते आ रहे हैं। पिछले साल जब उपरोक्त वनभूमि पर बाउंडरी खोदे जा रहे थे तो ग्रामीण एकजुट होकर आये और उसकी भराई कर दी तथा वहां काम रहे लोगों को भगा दिया। इसके बाद दलालों ने ग्रामीणों और उनकी अगुवाई करने वालों को मारने की धमकी भी दी थी। लेकिन उनकी धमकी से ग्रामीण डरे नहीं। इस मामले को लेकर ग्रामीण थाना और रेंज आॅफिस जाकर शिकायत की थी। लेकिन उन्होंने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की। ग्रामीणों का कहना है कि वनभूमि को बेचने के मामले में उनकी मिलीभगत है। ग्रामीणों की एकजुटता और तीखे विरोध के चलते करीब कई महीने मामला शांत था। अब दुबारा उस वनभूमि पर उन्होंने कब्जे की कोशिश की है। दलालों ने ग्रामीणों को कहा कि उक्त वनभूमि पर नरेगा के तहत काम हो रहा है, डोजर लगाकर पूरे जंगलों का बाउंडरी करना है। ग्रामीणों को संदेह हुआ कि कंपनी द्वारा कहीं यह धोखा तो नहीं है। ग्रामीणों का अंदेशा है कि वन विभाग ने उक्त वनभूमि को कंपनी के हाथों बेच दिया है। ग्रामीण उक्त वनभूमि पर नजर रखे हुए ही थे कि दो माह के अंदर वहां ईंट-पत्थर गिराया जाना शुरू हो गया। तब ग्रामीणों ने सोमरा उरांव की अध्यक्षता में गांवमसभा किया और निर्णय लिया कि कंपनी और दलाल फिर से हमारे जंगल पर कब्जा कर रहे हैं, इसको रोकना  होगा, नहीं तो वे जंगल में हमें घुसने नहीं देंगे। हम चार गांव के लोग इसी जंगल से दतवन, पत्ती, बैल-बकरी की चराई, रुगड़ा, खुखड़ी इत्यादि के लिए निर्भर हैं। अतः कंपनी के कब्जे को रोकने के लिए पूरा जोर लगाना होगा। इस निर्णय के तहत ग्रामीणों ने अपने परंपरागत हथियारों से लैस होकर उक्त वनभूमि के पास जाकर धरना में बैठ गये। वहां काम करने वाले मजदूर उन्हें आते देखकर पहले ही भाग गये। उसके बाद ग्रामीण रेंजर को बुलाने मांडर गये, रेंजर नहीं आये। किसी ने फोन करके उन्हें खबर कर दिया था। उन्हें डर था कि धरना-स्थल पर गये तो ग्रामीण उनकी पिटाई कर देंगे। बाद में धरना से उठकर ग्रामीण मांडर रेंज आॅफिस गये। वहां रेंजर-फोरेस्टर कोई नहीं था, वे ग्रामीणों के सवालों का सामना करने के डर से भाग गये थे।  </p>
<p>	उपरोक्त वनभूमि को वन विभाग द्वारा कंपनी को बेचने के विरुद्ध ग्रामीणों ने चान्हो प्रखण्ड का घेराव करने का निर्णय लिया है। नउदी गांव के लोग जंगल के मुद्दे पर काफी जागरुक हैं और एकजुट हैं। जंगल रक्षा में बच्चे-बूढ़े, महिला-पुरुष और नवजवान सब शामिल हैं। यहां ग्रामसभा और सामुदायिक वनाधिकार समिति सक्रिय है। ग्रामीणों को जंगल, जड़ी-बूटी, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण, वनाधिकार कानून जैसे मुद्दे पर जागरुक एवं एकजुट करने में लगे हुए हैं प्रमिला उरांव और जतरू उरांव। प्रमिला उरांव झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन की प्रखण्ड प्रभारी है और पिछले 7 सालों से ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय है। उसका पति जतरू उरांव उनका हर तरह से सहयोग कर रहे हैं।</p>
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		<item>
		<title>झारखण्डियों की जरूरत के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था जरूरी</title>
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		<pubDate>Sat, 29 May 2010 10:44:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Events]]></category>

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		<description><![CDATA[- अमिता टुटी -
शिक्षा पर तीन दिवसीय कार्यशाला
झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और क्राई की ओर से शिक्षा के मुद्दे को लेकर 24, 25 और 26 फरवरी 2010 को रांची के एचआरडीसी में कार्यशाला आयोजित की गई। इस दौरान भारत में शिक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और झारखण्ड के लिए अपेक्षित शिक्षा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>- अमिता टुटी -</strong><br />
<strong>शिक्षा पर तीन दिवसीय कार्यशाला</strong><br />
झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और क्राई की ओर से शिक्षा के मुद्दे को लेकर 24, 25 और 26 फरवरी 2010 को रांची के एचआरडीसी में कार्यशाला आयोजित की गई। इस दौरान भारत में शिक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और झारखण्ड के लिए अपेक्षित शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा हुई। इसमें झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के 45 प्रखण्ड प्रभारी भाग लिये। <span id="more-144"></span></p>
<p>	कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते हुए शैबाल बरोई ने कहा कि हम जब बच्चों के मुद्दे पर काम कर रहे हैं तो हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि हम बच्चों को समाज का अभिन्न हिस्सा मानते हैं या नहीं? निर्णय की प्रकिया में बच्चों की भागीदारी कितनी है? शिक्षा के मुद्दे पर हमारे इस कार्यशाला का उद्देश्य है शिक्षा नीति में बदलाव लाना। जेजेबीए को इस बात का ध्यान रखना है कि शिक्षा का आन्दोलन और जंगल बचाओ आन्दोलन कैसे साथ चले। मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षाविद डाॅ. बी.पी. केसरी ने कहा कि पुराने जमाने में समाज को ठीक रखने का काम धर्म से हुआ। आज आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का युग है। शिक्षा नीति या पाठ्यक्रम भी राजनीतिक पार्टी या सत्ता की विचारधारा के अनुसार बदलती है। सत्ता पर जो काबिज होता है, वह ज्ञान पर कब्जा बनाये रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को सुनिश्चित और प्रमाणित ज्ञान के बारे ही बताना चाहिए, विरोधाभासी बातें नहीं। समाज में जाति, धर्म इत्यादि के नाम पर कौन लड़ाता है? समाज और संसाधन को नेता और कुछ लोग लूट रहे हैं जबकि बाकी को भूखे-नंगे रहने, आत्महत्या करने को मजबूर कर रहे हैं, ये सब बच्चों को समझाना होगा। झारखंड में हम अपने बच्चों को सही ज्ञान नहीं देेंगे तो झारखण्ड डूब जाएगा। झारखंड में झारखंडियों को मातृभाषा में पढ़ाया जाए और झारखण्ड के बारे पढ़ाया जाये। हमलोगों को आने वाले 10-12 सालों के अंदर झारखंड में बहुत बड़ी भूमिका निभानी है। हमें जात-पात, धर्म, भाषा इत्यादि का भेदभाव भूलकर दुश्मन को पहचान कर परास्त करना होगा।  </p>
<p>शिक्षा पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग ने कहा कि ज्ञान, विचार और शिक्षा को  समाज ने लाखों सालों के संघर्ष और अनुभव से सीखा है। गु्रप चर्चा के लिए प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया और निम्न प्रश्न दिये गये:- 1. ज्ञान, सूचना और शिक्षा से आप क्या समझते हैं? 2. विज्ञान और ज्ञान की समझ कैसे बनी? 3. मुनष्य और जानवर से किस अर्थ में अलग है? चारों समूहों ने अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया। </p>
<p>दोपहर बाद के सत्र में पत्रकार फैसल अनुराग ने भारत के इतिहास को चार भागों में बांटते हुए मौर्य साम्राज्य, पानीपत से पलासी के युद्ध, पलासी युद्ध से भारत की आजादी और आजादी से आजतक भारत की ऐतिहासिक घटनाओं एवं परिस्थितियों की व्याख्या प्रस्तुत की। इस दौरान उन्होंने बतलाया कि समाज में हमेशा दो धारा रही है- मेहनतकशों की धारा और दूसरे के मेहनत से जीने की धारा। </p>
<p>वैदिक काल में भी दो धारा थी- 1. श्रमण और 2. ब्राह्मण। वर्णव्यवस्था ने ज्ञान पर कब्जा करके शूद्रों को ज्ञान से वंचित कर दिया। हमें समझने की जरूरत है कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटाा? उनहोंने भारत में लाॅर्ड मैकाले की शिक्षा नीति पर चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी नीति बनायी जो आत्मसम्मान रहित हो, जो संस्कृति विहीन हो और जो अंग्रेजों के प्रति समर्पित हो। इस चर्चा के बाद गु्रप चर्चा के लिए निम्न दो प्रश्न दिये गयेः- 1. प्रचीन भारत में किन दो धाराओं के बीच टकराव हुए? 2. लाॅर्ड मैकाले ने किस तरह की शिक्षा योजना प्रस्तुत की? इनपर भी ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति हुई। </p>
<p>दूसरे दिन सीताराम शास्त्री ने झारखण्ड में शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए, इस विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा में हमारी जरूरत का पाठ्यक्रम होना चाहिए। हमें ऐसी शिक्षा मिले जिससे हम अपने इलाके के संसाधनों के मालिक बनें। शिक्षा अपनी भाषा में होनी चाहिए। देशी भाषा में शिक्षा मिलनी चाहिए। ब्रिज स्कूल की व्यवस्था होनी चाहिए। शैबाल बरोई ने कहा कि समाज में जो गैरबराबरी या विषमता है वह शिक्षा व्यवस्था में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा में हम अपने पाठ्यक्रम को तुरंत लागू नहीं कर सकते हैं। अतः वर्तमान शिक्षा में हस्तक्षेप करनी होगी और इसे गांव से करनी होगी।</p>
<p>बाल अखड़ा कार्यक्रम में केवल शिक्षा और बाल अधिकार की बात नहीं है, बच्चों के सोच में समाज के अनुकूल बदलाव लाना भी है। ग्रुप चर्चा के लिए निम्न तीन प्रश्न थेः-</p>
<ul>
<li>1. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था क्या है?</li>
<li>2. झारखंड में कैसी शिक्षा होनी चाहिए?</li>
<li>3. झारखण्ड में 10वीं कक्षा के इतिहास, भूगोल, साहित्य  और विज्ञान के पाठ्यक्रम में क्या होना चाहिए?</li>
</ul>
<p>ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति में कहा गया कि वर्तमान शिक्षा बाजारीकरण, केवल साक्षरता, गुलामी, भिखारी, झारखंड की बर्बादी, एकाधिकार को बढ़ावा देने तथा झारखण्ड को खोखला और विनाश करने वाली है। झारखंड में जो शिक्षा होनी चाहिए उसके अंतर्गत मातृभाषा, अपनी संस्कृति और पहचान, गांव की सामाजिक व्यवस्था, क्षेत्रीय विशेषता, स्थानीय एवं क्षेत्रीय भूगोल और झारखंडी इतिहास, कृषि, जीविका आधारित ज्ञान, पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान, आत्मनिर्भर शिक्षा, समान शिक्षा और झारखंडी विशेषता आधारित शिक्षा होनी होनी चाहिए। साहित्य के अंतर्गत झारखंडी समाज की लोककथाएं, लोकगीत और होड़ोपैथी का समावेश होना चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर यह सवाल उभर कर आया कि हमारे जरूरत के अनुरूप शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम और साहित्य कौन लिखेगा? अंत में निम्न प्रस्ताव लिये गयेः- 1. प्रखंड प्रभारीगण हर प्रखंड क्षेत्र से ऐसे व्यक्ति के बारे लेख या रिपोर्ट लिखकर देंगे जिसने समाज के लिए अच्छा काम या आन्दोलन किया है। 2. बाल अखड़ा पत्रिका प्रकाशन और बालअखड़ा कार्यशाला के लिए प्रशिक्षण सामग्री तैयार करना।</p>
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		<title>वन विभाग ने सीरगढ़ संथाल टोला के घरों को तोड़ा, प्राथमिकी दर्ज</title>
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		<pubDate>Sat, 29 May 2010 10:37:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[News]]></category>

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		<description><![CDATA[- जेवियर कुजूर -
यह विडम्बना ही है कि आदिवासियों और वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के उद्देष्य से केन्द्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून 2006 के बन जाने के बाद भी वनभूमि पर बसे आदिवासियों के घरों को वन विभाग द्वारा तोड़ा जा रहा है, उन्हे बेघर किया जा रहा है और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>- जेवियर कुजूर -</strong><br />
यह विडम्बना ही है कि आदिवासियों और वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के उद्देष्य से केन्द्र सरकार द्वारा वनाधिकार कानून 2006 के बन जाने के बाद भी वनभूमि पर बसे आदिवासियों के घरों को वन विभाग द्वारा तोड़ा जा रहा है, उन्हे बेघर किया जा रहा है और बड़ी बर्बरता से उनके मानवाधिकारों को कुचला जा रहा है। इसका एक ताजा उदाहरण है बरामथान सीरगढ़ संथाल टोला जहां टोले के 28 परिवार के लोग सामुहिक रूप से घर बना रहे थे, उस घर को वन विभाग ने तोड़ दिया। <span id="more-141"></span></p>
<p>	उपरोक्त घटना की खबर संथाल टोला के ग्रामीणों ने संतोष बास्के के माध्यम से झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन को दी और इस मामले पर सहयोग करने सहयोग करने का आग्रह किया। उक्त घटना के खिलाफ 8 मार्च, 2010 को देवरी थाने में सिल्वेस्टर मुर्मू ने ग्रामीणों की ओर से एक प्राथमिकी भी दर्ज की है। उसके अनुसार 3 मार्च 2010 को दिन के करीब एक बजे वनपाल पृथेष्वर महतो, नरेष प्रसाद, जय प्रकाष सिंह, रामअवधेष सिंह, सुनील सिंह और टी.एन. सिंह 6 ट्रैक्टर लेकर सीरगढ़ संथाल टोला आ धमके तथा ग्रामीणों को बिना को सूचना दिये धरों को धंसाना शुरू किये। उन्होंने घर में रखे सब सामानों को बाहर फेंक दिया। डेगची-बर्तन में रखे भोजन और दाल-सब्जी को को भी फेंक दिया। 15 हजार ईंट, 1 मोटर साइकिल, 2 साइकिल, तीर-धनुष, कुदाल, गैंता, गैस, पेट्रेमेक्स, एक सोफा, तोता सहित एक पिंजरा, कपड़ा-लत्ता और अन्य कई तरह के सामानों को भी ट्रेक्टर में लादकर ले गये। इतना ही नहीं, उन्होंने स्टीफन हांसदा पिता स्व. जटा हांसदा को भी उठाकर लेते गये। उसे 17 महीने जेल में रखा गया था।</p>
<p>	उपरोक्त घटना के मामले में 12 मई 2010 को वन प्रमण्डल गिरीडीह ने सीरगढ़ संथाल टोला के स्टीफन हांसदा, अंथोनी मुर्मू और टिनकू हांसदा के नाम एक नोटिस जारी कर उन्हें 24 मई, 2010 को उपस्थित होने और लिखित जवाब देने को कहा है। नोटिस में इन तीनों पर भारतीय वन 1927 (बिहार संशोधन 1989) अधिनियम के धारा- 52 के उपधारा-3 के तहत कार्रवाई करने की बात लिखी गई है।      </p>
<p>	सीरगढ़ संथाल टोला गिरीडीह जिले के देवरी प्रखण्ड अंतर्गत मौजा बरामथान का एक संथाल टोला है। इस टोले में संथाल आदिवासी रहते हैं। वे 1983 से मिट्टी और बांस के मकान एवं झोपड़ी बनाते रहे हैं। तब से अब तक वन विभाग ने कम से कम चार बार घरों एवं झोपड़ियों को तोड़ा है तथा उनपर कई तरह के अत्याचार एवं जुल्म किया है। दर्ज प्राथमिकी में उल्लेख है कि ग्रामीणों के पूर्वज रतई माँझी वल्द अर्जुुन माँझी के नाम से सन् 17 माघ 1350 में जमींदार श्री अमीन मियां वल्द सोकोर मियां साकिन मौजा बरामथान, थाना-देवरी, जिला- गिरीडीह में 231 एकड़ 76 डिसमिल हुकुमनामा बन्दोबस्ती है। ग्रामीणों का कहना है कि उसी समय से उस जमीन को उनके बाप-दादा जोत-आबाद करते आये। अब कुछ वर्ष पहले से उनके वंशज भी उस जमीन पर खेती खेती शुरू किये हैं। प्राथमिकी में कहा गया है कि वन विभाग की यह मनमानी हरकत वनाधिकार कानून 2006 का उल्लंघन है। अतः वन अधिकारियों पर कानूनी कारवाई की जाए।</p>
<p>	पिछले वर्ष 27 मई, 2009 को इसी टोले के बजुन टुडू, जुनसा मुमू और मंगरा मुर्मू को वन विभाग और  पुलिस ने वनभूमि पर अवैध निर्माण कार्य के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। इन तीनों पर भारतीय वन 2927 (बिहार संशोधन 1989) अधिनियम की धारा 33(1) (सी) एवं 63 का उल्लंघन का आरोप है। इस मामले पर बजुन टूडू ने आरक्षी अधीक्षक गिरिडीह को लिखे आवेदन में कहा है कि 27 मई, 2009 को दिन के करीब 11 बजे वन विभाग के रेंजर, फोरेस्टर और गार्ड पुलिस को लेकर सीरगढ़ संथाल टोला पहुंचे। वे एक घर में घुसे और तेरेसा मरांडी को धकेल कर घर से निकाल दये तथा उस घर में रखे जमीन कागजात, नक्शा, 10 गईंता, 10 कुदाल, 2 किलो चावल, 40 किलो दाल, 10 किलो नमक, 1 जोड़ा नगाड़ा, खाने-पीने के सामान तथा सांस्कृतिक सामान ले गये। प्राथमिकी में उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है। इस आवेदन के जवाब में 13 फरवरी, 2010 को मनोहर मरांडी, अवर सचिव मुख्यमंत्री सचिवालय, झारखण्ड, रांची की ओर से उपायुक्त गिरीडीह को लिखे गये पत्र (पत्रांक-7301476) में संबंधित मामले पर आवेदन पत्र में वर्णित आलोक में शीघ्र जांचकर नियम अनुकूल कार्रवाई करते हुए किये गये कार्रवाई से मुख्यमंत्री सचिवालय को अवगत कराने का आग्रह किया गया है।</p>
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		<title>आमंत्रण</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Jan 2010 17:13:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Events]]></category>

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		<description><![CDATA[जोहार ! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आपको हमंे यह बतलाते हुए खुशी हो रही है कि झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन का 7वां वार्षिक सम्मेलन रांची में हो रहा है। इस दो दिवसीय सम्मेलन में झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन से जुड़े करीब 600 प्रतिनिधि भाग लेंगे। ये प्रतिनिधि झाड़खण्ड के विभिन्न प्रखण्डों से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जोहार ! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आपको हमंे यह बतलाते हुए खुशी हो रही है कि झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन का 7वां वार्षिक सम्मेलन रांची में हो रहा है। इस दो दिवसीय सम्मेलन में झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन से जुड़े करीब 600 प्रतिनिधि भाग लेंगे। <span id="more-134"></span>ये प्रतिनिधि झाड़खण्ड के विभिन्न प्रखण्डों से आयेंगे। साथ ही देश में जंगल अधिकार आन्दोलन से जुड़े कुछ अन्य राज्यों के अतिथि भी शामिल होंगे। सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय होगा- ‘झारखण्ड में वनाधिकार कानून 2006 का क्रियान्वयन: संघर्ष और चुनौतियां’। सम्मेलन के दौरान झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के केद्रीय समिति के पुनर्गठन के साथ ही आन्दोलन की भावी रणनीति पर भी विचार होगा।</p>
<p>	उद्घाटन सत्र में सम्मेलन के उद्देश्य की जानकारी के साथ ही मुख्य अतिथि और अन्य विशिष्ट वक्ताओं के वक्तव्य होंगे।<br />
	आप इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए सादर आमंत्रित हैं। </p>
<p>सम्मेलन की तारीख: 28 और 29 जनवरी, 2010</p>
<p>कार्यक्रम का स्थान: वाई. एम. सी. ए. सभागार, कांटाटोली, पुरुलिया रोड, रांची<br />
(फ्रेन्ड्स पेट्रोल टंकी के बगल में।)<br />
कार्यक्रम शुरू होने का समय: 10.00 बजे पूर्वाह्न।<br />
उद्घाटन सत्र: 10.00 बजे से 1.00 बजे तक।<br />
दोपहर भोजन: 1.00 बजे से 2.00 बजे। </p>
<p>निवेदक</p>
<p>संजय बसु मल्लिक, सूर्यमनी भगत, सनिका टूटी, सोहनलाल कुम्हार, जेवियर कुजूर, सावन हांसदा<br />
झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन, रांची</p>
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