Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
जलवायु परिवर्तन : क्योटो सन्धि समस्या एवं समाधान
- डा. विनयन -
हमारे पृथ्वी ग्रह की जलवायु पाँच मुख्य कारकों के पारस्पारिक सम्बन्धों वाली एक जटिल प्रणाली है. ये पाँच कारक हैं- वायुमंडल (Atmosphere), समुद्र, हिम एवं हिमाच्छादित क्षेत्र (Criosphere) जैवमंडल (Biosphere) एवं मिट्टी तथा गाद या तलछट व चट्टानें (Geosphere). ये पाँचों तत्व सूर्य से सीधे-सीधे जुडे हैं. इन पाँच कारकों के अतिरिक्त जलवायु को प्रभावित करने वाला छठा अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक है एन्थ्रोपोजेनिक कारक या इंसानी कार्रवाही का प्रभाव.

जलवायु का सौर ऊर्जा से सीध सम्बन्ध है. सौर ऊर्जा धरती की सतह पर पहुँच कर पराबैगनी विकिरण (इन्फ्रारेड रेडियेशन) के रूप में अन्तरिक्ष में वापस हो जाती है. इस आवागमन के दौरान ऊर्जा वातावरण से होकर गुजरती है. ऑक्सीजन-नाईट्रोजन एवं आर्गन के अलावा वातावरण में अन्य गैसों जैसे कार्बनडाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन, जलवाष्प आदि का सम्मिश्रण मौजूद है. ये सभी गैस पृथ्वी को चारों ओर से घेर कर एक वातावरण बनाती हैं जो पृथ्वी के अन्य सभी अवयवों में समाहित रहता है. ये गैस पृथ्वी तल तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा का लगभग २५ः सोख लेती हैं जबकि सौर ऊर्जा का ३०ः विकिरण द्वारा वापस अन्तरिक्ष में चला जाता है एवं ४५ः पृथ्वी व समुद्रों द्वारा सोख लिया जाता है. इस प्रकार पृथ्वी की प्राकृतिक तापमान नियन्त्रण प्रणाली एक पौध-घर (ग्रीन हाउस ) के समान है. अतः इस प्रणाली में सक्रिय गैसों कार्बनडाईआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड, ओजोन, क्लोरो फ्लोरो कार्बन एवं वाष्प को पौध-घर गैस (ग्रीन हाउस गैस ) कहते हैं. पौध-घर गैस पृथ्वी से विकिरण द्वारा वापस जाने वाली ऊर्जा को सोख कर पृथ्वी का तापमान बढाती हैं. पृथ्वी तल पर तरल रूप में जल की उपस्थित में भी पौध-घर गैस को अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका है.
जलवायु की दृष्टि से पौध-घर प्रभाव कोई समस्या नहीं है. वास्तव में पौध-घर गैस-युक्त वातावरण प्रणाली के नाजुक सन्तुलन के कारण ही पृथ्वी पर जीवन का विकास संभव हो सका है. असली समस्या है, मानवीय क्रियाओं के फलस्वरूप पौध-घर गैस की मात्रा में असाधारण वृद्धि, जिसका सीधा-सीधा परिणाम है वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि. धरती की हालत तेज गर्मी में कई कम्बल ओढ व्यक्ति जैसी हो गई है. पौधों को जाडा-पाला से बचाने के लिए बनाया गया पौध-घर गर्म भट्टी में तब्दील हो गया है.
तापमान वृद्धि
यद्यपि पृथ्वी का तापमान अस्थिर और अनिश्चित है, साथ ही यह पृथ्वी के आन्तरिक व बाह्य परिवर्तनों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील है लेकिन पिछले दो लाख वर्षों के दौरान, इस लम्बे समय की तुलना में इसमें बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है. वैज्ञानिकों के अनुसार हिम युग में, जब पृथ्वी का अधिकांश भाग बर्फ से ढका था, औसत तापमान आज से मात्र ५० सेल्सियस ही कम था. आज पृथ्वी का औसत तापमान लगभग १४० सेल्सियस है (यदि ग्रीन हाउस गैस होती ही नहीं तो यह तापमान -१८० सेल्सियस होता) औद्योगिक क्रान्ति के बाद से पिछले २०० वर्षों में, खास तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पृथ्वी के तापमान में भारी वृद्धि हुई है. इस दौरान तापमान में ०.३० से ०.६० सेल्सियस की औसत वृद्धि हुई है. यह तापमान वृद्धि पृथ्वी तल एवं समुद्र तल पर स्पष्ट रूप में देखी जा सकती है और हिमशैलों के तेजी से गलने या पीछे खिसकने जैसे संकेत कों में परिलक्षित होती है. विश्व स्तर पर सन् १९९८ अब-तक का सबसे गर्म वर्ष एवं नब्बे का दशक सबसे गर्म दशक था. पृथ्वी के तापमान की यह असाधारण वृद्धि, उस इंसानी क्रियाकलाप से सीधी जुडी है जिसके फलस्वरूप पौध-घर गैसों खास तौर पर कार्बन डाईआक्साइड के वातावरण में भारी बढोतरी हुई है.
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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