Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
झारखण्डियों की जरूरत के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था जरूरी
- अमिता टुटी -
शिक्षा पर तीन दिवसीय कार्यशाला
झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और क्राई की ओर से शिक्षा के मुद्दे को लेकर 24, 25 और 26 फरवरी 2010 को रांची के एचआरडीसी में कार्यशाला आयोजित की गई। इस दौरान भारत में शिक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और झारखण्ड के लिए अपेक्षित शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा हुई। इसमें झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के 45 प्रखण्ड प्रभारी भाग लिये।
कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते हुए शैबाल बरोई ने कहा कि हम जब बच्चों के मुद्दे पर काम कर रहे हैं तो हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि हम बच्चों को समाज का अभिन्न हिस्सा मानते हैं या नहीं? निर्णय की प्रकिया में बच्चों की भागीदारी कितनी है? शिक्षा के मुद्दे पर हमारे इस कार्यशाला का उद्देश्य है शिक्षा नीति में बदलाव लाना। जेजेबीए को इस बात का ध्यान रखना है कि शिक्षा का आन्दोलन और जंगल बचाओ आन्दोलन कैसे साथ चले। मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षाविद डाॅ. बी.पी. केसरी ने कहा कि पुराने जमाने में समाज को ठीक रखने का काम धर्म से हुआ। आज आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का युग है। शिक्षा नीति या पाठ्यक्रम भी राजनीतिक पार्टी या सत्ता की विचारधारा के अनुसार बदलती है। सत्ता पर जो काबिज होता है, वह ज्ञान पर कब्जा बनाये रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को सुनिश्चित और प्रमाणित ज्ञान के बारे ही बताना चाहिए, विरोधाभासी बातें नहीं। समाज में जाति, धर्म इत्यादि के नाम पर कौन लड़ाता है? समाज और संसाधन को नेता और कुछ लोग लूट रहे हैं जबकि बाकी को भूखे-नंगे रहने, आत्महत्या करने को मजबूर कर रहे हैं, ये सब बच्चों को समझाना होगा। झारखंड में हम अपने बच्चों को सही ज्ञान नहीं देेंगे तो झारखण्ड डूब जाएगा। झारखंड में झारखंडियों को मातृभाषा में पढ़ाया जाए और झारखण्ड के बारे पढ़ाया जाये। हमलोगों को आने वाले 10-12 सालों के अंदर झारखंड में बहुत बड़ी भूमिका निभानी है। हमें जात-पात, धर्म, भाषा इत्यादि का भेदभाव भूलकर दुश्मन को पहचान कर परास्त करना होगा।
शिक्षा पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग ने कहा कि ज्ञान, विचार और शिक्षा को समाज ने लाखों सालों के संघर्ष और अनुभव से सीखा है। गु्रप चर्चा के लिए प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया और निम्न प्रश्न दिये गये:- 1. ज्ञान, सूचना और शिक्षा से आप क्या समझते हैं? 2. विज्ञान और ज्ञान की समझ कैसे बनी? 3. मुनष्य और जानवर से किस अर्थ में अलग है? चारों समूहों ने अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया।
दोपहर बाद के सत्र में पत्रकार फैसल अनुराग ने भारत के इतिहास को चार भागों में बांटते हुए मौर्य साम्राज्य, पानीपत से पलासी के युद्ध, पलासी युद्ध से भारत की आजादी और आजादी से आजतक भारत की ऐतिहासिक घटनाओं एवं परिस्थितियों की व्याख्या प्रस्तुत की। इस दौरान उन्होंने बतलाया कि समाज में हमेशा दो धारा रही है- मेहनतकशों की धारा और दूसरे के मेहनत से जीने की धारा।
वैदिक काल में भी दो धारा थी- 1. श्रमण और 2. ब्राह्मण। वर्णव्यवस्था ने ज्ञान पर कब्जा करके शूद्रों को ज्ञान से वंचित कर दिया। हमें समझने की जरूरत है कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों काटाा? उनहोंने भारत में लाॅर्ड मैकाले की शिक्षा नीति पर चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी नीति बनायी जो आत्मसम्मान रहित हो, जो संस्कृति विहीन हो और जो अंग्रेजों के प्रति समर्पित हो। इस चर्चा के बाद गु्रप चर्चा के लिए निम्न दो प्रश्न दिये गयेः- 1. प्रचीन भारत में किन दो धाराओं के बीच टकराव हुए? 2. लाॅर्ड मैकाले ने किस तरह की शिक्षा योजना प्रस्तुत की? इनपर भी ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति हुई।
दूसरे दिन सीताराम शास्त्री ने झारखण्ड में शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए, इस विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा में हमारी जरूरत का पाठ्यक्रम होना चाहिए। हमें ऐसी शिक्षा मिले जिससे हम अपने इलाके के संसाधनों के मालिक बनें। शिक्षा अपनी भाषा में होनी चाहिए। देशी भाषा में शिक्षा मिलनी चाहिए। ब्रिज स्कूल की व्यवस्था होनी चाहिए। शैबाल बरोई ने कहा कि समाज में जो गैरबराबरी या विषमता है वह शिक्षा व्यवस्था में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा में हम अपने पाठ्यक्रम को तुरंत लागू नहीं कर सकते हैं। अतः वर्तमान शिक्षा में हस्तक्षेप करनी होगी और इसे गांव से करनी होगी।
बाल अखड़ा कार्यक्रम में केवल शिक्षा और बाल अधिकार की बात नहीं है, बच्चों के सोच में समाज के अनुकूल बदलाव लाना भी है। ग्रुप चर्चा के लिए निम्न तीन प्रश्न थेः-
- 1. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था क्या है?
- 2. झारखंड में कैसी शिक्षा होनी चाहिए?
- 3. झारखण्ड में 10वीं कक्षा के इतिहास, भूगोल, साहित्य और विज्ञान के पाठ्यक्रम में क्या होना चाहिए?
ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति में कहा गया कि वर्तमान शिक्षा बाजारीकरण, केवल साक्षरता, गुलामी, भिखारी, झारखंड की बर्बादी, एकाधिकार को बढ़ावा देने तथा झारखण्ड को खोखला और विनाश करने वाली है। झारखंड में जो शिक्षा होनी चाहिए उसके अंतर्गत मातृभाषा, अपनी संस्कृति और पहचान, गांव की सामाजिक व्यवस्था, क्षेत्रीय विशेषता, स्थानीय एवं क्षेत्रीय भूगोल और झारखंडी इतिहास, कृषि, जीविका आधारित ज्ञान, पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान, आत्मनिर्भर शिक्षा, समान शिक्षा और झारखंडी विशेषता आधारित शिक्षा होनी होनी चाहिए। साहित्य के अंतर्गत झारखंडी समाज की लोककथाएं, लोकगीत और होड़ोपैथी का समावेश होना चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर यह सवाल उभर कर आया कि हमारे जरूरत के अनुरूप शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम और साहित्य कौन लिखेगा? अंत में निम्न प्रस्ताव लिये गयेः- 1. प्रखंड प्रभारीगण हर प्रखंड क्षेत्र से ऐसे व्यक्ति के बारे लेख या रिपोर्ट लिखकर देंगे जिसने समाज के लिए अच्छा काम या आन्दोलन किया है। 2. बाल अखड़ा पत्रिका प्रकाशन और बालअखड़ा कार्यशाला के लिए प्रशिक्षण सामग्री तैयार करना।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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