Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
वनभूमि को बेचने से दलालों और ग्रामीणों के बीच तनाव, हिंसा की आशंका
- प्रमिला उरांव -
यह एक विडम्बना ही है कि वनाधिकार कानून 2006 बनने के बाद भी वनभूमि पर महाजनों और कंपनियों का कब्जा हो रहा है। एक ओर वनभूमि के असल दावेदारों को उनके परंपरागत और कानूनी अधिकारों से वंचित करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर वनविभाग द्वारा वनभूमि को महाजनों-कंपनियों के हाथों बेची जा रही है। ऐसी ही एक घटना है नउदी गांव की जहां करीब एक हेक्टेयर वनभूमि को वनविभाग और दलालों ने मिलकर महाजनों को बेच दिया है। ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं। मामले को लेकर ग्रामीणों और दलालों के बीच तनाव फैल गया है। कभी भी हिंसक घटना हो सकती है। ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।
नउदी गांव रांची जिले के चान्हो प्रखण्ड अंतर्गत रांची से करीब 40 कि.मी. की दूरी पर है। यह शहीद बीर बुधु भगत के गांव के नजदीक का ही एक गांव है। इस गांव के लोग पिछले 7 सालों से जंगल रक्षा करते आ रहे हैं। पिछले साल जब उपरोक्त वनभूमि पर बाउंडरी खोदे जा रहे थे तो ग्रामीण एकजुट होकर आये और उसकी भराई कर दी तथा वहां काम रहे लोगों को भगा दिया। इसके बाद दलालों ने ग्रामीणों और उनकी अगुवाई करने वालों को मारने की धमकी भी दी थी। लेकिन उनकी धमकी से ग्रामीण डरे नहीं। इस मामले को लेकर ग्रामीण थाना और रेंज आॅफिस जाकर शिकायत की थी। लेकिन उन्होंने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की। ग्रामीणों का कहना है कि वनभूमि को बेचने के मामले में उनकी मिलीभगत है। ग्रामीणों की एकजुटता और तीखे विरोध के चलते करीब कई महीने मामला शांत था। अब दुबारा उस वनभूमि पर उन्होंने कब्जे की कोशिश की है। दलालों ने ग्रामीणों को कहा कि उक्त वनभूमि पर नरेगा के तहत काम हो रहा है, डोजर लगाकर पूरे जंगलों का बाउंडरी करना है। ग्रामीणों को संदेह हुआ कि कंपनी द्वारा कहीं यह धोखा तो नहीं है। ग्रामीणों का अंदेशा है कि वन विभाग ने उक्त वनभूमि को कंपनी के हाथों बेच दिया है। ग्रामीण उक्त वनभूमि पर नजर रखे हुए ही थे कि दो माह के अंदर वहां ईंट-पत्थर गिराया जाना शुरू हो गया। तब ग्रामीणों ने सोमरा उरांव की अध्यक्षता में गांवमसभा किया और निर्णय लिया कि कंपनी और दलाल फिर से हमारे जंगल पर कब्जा कर रहे हैं, इसको रोकना होगा, नहीं तो वे जंगल में हमें घुसने नहीं देंगे। हम चार गांव के लोग इसी जंगल से दतवन, पत्ती, बैल-बकरी की चराई, रुगड़ा, खुखड़ी इत्यादि के लिए निर्भर हैं। अतः कंपनी के कब्जे को रोकने के लिए पूरा जोर लगाना होगा। इस निर्णय के तहत ग्रामीणों ने अपने परंपरागत हथियारों से लैस होकर उक्त वनभूमि के पास जाकर धरना में बैठ गये। वहां काम करने वाले मजदूर उन्हें आते देखकर पहले ही भाग गये। उसके बाद ग्रामीण रेंजर को बुलाने मांडर गये, रेंजर नहीं आये। किसी ने फोन करके उन्हें खबर कर दिया था। उन्हें डर था कि धरना-स्थल पर गये तो ग्रामीण उनकी पिटाई कर देंगे। बाद में धरना से उठकर ग्रामीण मांडर रेंज आॅफिस गये। वहां रेंजर-फोरेस्टर कोई नहीं था, वे ग्रामीणों के सवालों का सामना करने के डर से भाग गये थे।
उपरोक्त वनभूमि को वन विभाग द्वारा कंपनी को बेचने के विरुद्ध ग्रामीणों ने चान्हो प्रखण्ड का घेराव करने का निर्णय लिया है। नउदी गांव के लोग जंगल के मुद्दे पर काफी जागरुक हैं और एकजुट हैं। जंगल रक्षा में बच्चे-बूढ़े, महिला-पुरुष और नवजवान सब शामिल हैं। यहां ग्रामसभा और सामुदायिक वनाधिकार समिति सक्रिय है। ग्रामीणों को जंगल, जड़ी-बूटी, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण, वनाधिकार कानून जैसे मुद्दे पर जागरुक एवं एकजुट करने में लगे हुए हैं प्रमिला उरांव और जतरू उरांव। प्रमिला उरांव झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन की प्रखण्ड प्रभारी है और पिछले 7 सालों से ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय है। उसका पति जतरू उरांव उनका हर तरह से सहयोग कर रहे हैं।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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