Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
फिलीपीन्स की महिलाओं ने किया झारखण्ड में आदिवासी नेतृत्व प्रशिक्षण का मूल्यांकन
- जेवियर कुजूर -
वर्ष 2009 में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में बिन्द्राई इन्सटीट्यूट फाॅर रिसर्च स्टडी एंड एक्शन ‘बिरसा’ की ओर से आदिवासी सामुदायिक संगठनकों एवं नेतृत्वकर्ताओं के लिए कुल 8 प्रशिक्षण कार्यशाला चलाये गये थे। इसी के मूल्यांकन के सिलसिले में फिलीपीन्स से जोआन कार्लिंग और जॉन वेलीनेबा झारखण्ड आयी हुई थीं। वे 13 फरवरी को 6.30 रांची पहुंचने के बाद 11.30 बजे बुड़मू के कोटोरी गांव पहुंचे और मूल्यांकन बैठक में शामिल हुए जो शाम 5 बजे तक चला। टीम में झारखण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के संजय बसु मल्लिक, जेवियर कुजूर और राधाकृष्ण सिंह मुण्डा शामिल थे।
कोटारी स्थित जंगल बचाओ आन्दोलन के आॅफिस के प्रांगण में बाल अखड़ा के सदस्यों ने गीत और मांदर की थाप के साथ फूलगुच्छे देकर जोआन कार्लिंग और जाॅ का स्वागत किया। उसके बाद वहां स्थित हाॅल में मूल्यांकन बैठक शुरू हुई। सबसे पहले फिलीपीनो महिलाओं ने अपना परिचय और झारखण्ड आने के अपने उद्देश्यों को बतलाया। जोआन कार्लिंग ने बतलया कि वह फिलीपीन्स के कोर्डिलेरा से है और 20 सालों से आन्दोलनकारी है। वर्ष 2008 में वह महासचिव के पदभार के साथ एआईपीपी से जुड़ी। एआईपीपी का मुख्य उद्देश्य है आदिवासी ज्ञान एवं अधिकारों के लिए संघर्ष और मानवाधिकार हेतु अभियान चलाना।
मूल्यांकन चर्चा के दौरान प्रतिभागियों से जॉन ने मुख्य रूप से छः सवाल पूछेः-
- 1. आपके मुद्दे और संघर्ष क्या हैं?
- 2. आदिवासी सामुदायिक संगठनकों एवं नेतृत्वकर्ताओं के प्रशिक्षण कार्यशाला से आपको क्या अनुभव हुआ?
- 3. कार्यशाला में आपने क्या सीखा और सीखने के बाद आप अपने क्षे़त्र में क्या कर रहे हैं?
- 4. क्या इस प्रशिक्षण से आप नेतृत्व के लिए सक्षम हो पाये हैं?
- 5. कार्यशला में क्या कमी थी?
- 6. प्रशिक्षण को बेहतर बनाने के लिए आपका सुझाव क्या है?
इन सवालों का जवाब प्रशिक्षण प्राप्त सभी प्रतिभागियों ने एक-एक करके दिया जो संतोषजनक रहा। मूल्यांकन के दौरान विस्थापन, पलायन, वनाधिकार कानून, नरेगा, जंगल बचाओ आन्दोलन इत्यादि पर चर्चा हुई। विनय उरांव ने टाना आन्दोलन की चर्चा करते कहा कि झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है। मूल्यांकन बैठक में उपस्थित 24 लोगों में से 11 प्रशिक्षणप्राप्त प्रतिभागी आये थे। कोटारी में आदिवासी सामुदायिक नेतृत्वकर्ताओं का पहला प्रशिक्षण हुआ था जिसमें चान्हो, बुड़मू, चंदवा और बालूमाथ और कांके प्रखण्ड के करीब 35 प्रतिभागी शामिल थे।
14 फरवरी को यह टीम चाईबासा पहुंची। रास्ते में ये तोरपा के एनएचपीसी के अतिथिशाला परिसर में मुण्डा पड़हा की बैठक में भी शामिल हुए जहां मुण्डा पड़हा अपने परंपरागत स्वशासन और समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा के सवाल पर जुटे थे। 15 फरवरी को गुइरा स्थित टीआरटीसी में पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला-खरसवां और जमशेदपर से पहंुचे प्रतिभागियों के बीच मूल्यांकन बैठक हुई। इस दौरान अर्जुन समद ने तुरामडीह में यूरेनियम खदान से होने वाले विस्थापन और प्रदूषण की चर्चा करते हुए बतलाया कि 1967 में स्थापित यूसीआईएल के तहत अभी 6 परियोजनाएं चल रही हैं। यहां के विस्थापतों का पुनर्वास नहीं हो पाया है, सिर्फ 5 प्रतिशत लोगों को मुआवजा मिला है। कंपनी द्वारा श्रम कानून का उल्लंघन भी किया जाता है। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती, उल्टे आन्दोलन करने वाले समूहों पर कंपनी द्वारा आरोप लगाया जाता है कि इनका संबंध अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से है। स्थानीय युवा वर्ग इस आन्दोलन में है। इससे कचरा फेंकने के लिए टेलिंग पोंड के लिए भूमि अधिग्रहण और क्षेत्र में जंगल कटाई पर रोक लगी है। कंपनी मंे होने वाले नियुक्तियों के मामले में अनियमितता को भंडाफोड़ करने लिए ये युवा सूचना अधिकार कानून को काम में ला रहे हैं।
उधर नेतृत्व प्रशिक्षण के बाद महिलाएं भी और सक्रिय हुई हैं। वे रिपोर्टिंग, दस्तावेजीकरण और आॅफिस कार्याें को बेहतर ढंग से कर रही हैं। सरायकेला के जीतमनी टुडू ने बतलाया कि महिलाओं ने संगठित होकर जुपीटर सीमेंट फैक्टरी को बंद कराया। राजनगर प्रखण्ड अंतर्गत प्रस्तावित डैम निर्माण के विरुद्ध ग्रामीणों को जागरुक कर रही हैं। वे विस्थापन और महिला हिंसा के खिलाफ तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे मुद्दों पर जागरूक हुई हैं। मूल्यांकन के दौरान प्रतिभागियों ने बतलाया कि प्रशिक्षण से संगठन की समझ और संगठन चलाने, संगठन से लोगों को जोड़ने, संगठन के आय-व्यय का रख-रखरखाव, जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के हक, नेतृत्व कला एवं गुण, महिला नेतृत्व, आत्मविश्वास इत्यादि सीख मिली। इस दौरान एतवारी नाग, श्याम सुंडी, मनोज तिरिया, विक्टोरिया कुजूर, सत्य देवगम, रसिका, समित्रा तियु, सिद्धार्थ और गीता गागराई ने भी अपनी बातों को रखा। इन बातांे को मूल्यांकनकर्ताओं ने उत्साहनजनक कहा। बाद में उन्होंने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कमेटी के सदस्यों के साथ चर्चा कर ‘बिरसा’ के पांचों यूनिट की पृष्टभूमि, कार्यक्रम और चुनौतियों के बारे भी जानकारी ली।
16 फरवरी को चाईबासा स्थित बिरसा जोहार आॅफिस में उनके स्टाफ सदस्यों के साथ बैठक हुई। इस दौरान ‘जोहार’ के सचिव रमेश जेराई ने ‘बिरसा’ की पृष्ठभूमि, उद्देश्य और और वर्तमान कार्यक्रम और संगठनिक ढांचा के बारे विस्तार से जानकारी दी। फिर नेतृत्व प्रशिक्षण के समन्वयक की हैसियत से उन्होंने इसका मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि इससे झारखंड में विभिन्न आदिवासी संगठनों, आन्दोलनों के प्रतिनिधियों और नेतृत्वकर्ताओं से सम्पर्क एवं संबंध बढ़ा है। फिलीपीन्स की महिलाओं ने चाईबासा से लौटने के क्रम में निकट के गुन्टिया गांव का भ्रमण किया और वहां के महिलाओं से बातचीत की। महिलाओं ने बतलाया कि उन्होंने संगठित होकर वहां आने वाली कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण को रोक दिया है।
आदिवासी सामुदायिक नेतृत्व प्रशिक्षण के तहत झारखण्ड में बुड़मू (रांची), हजारीबाग, महुंआडांड़ (लातेहार), चाईबासा, खूंटी, सरायकेला, दुमका और जमशेदपुर में ये कार्यशाला किये गये। यह कार्यक्रम एशिया इंडीजिनस पीपुल्स पैक्ट के सहयोग से किया गया। इन कार्यशालाओं में खास तौर से वैसे लोगों को प्रतिभागी के तौर पर चयन किया गया था जो सामुदायिक स्तर पर आदिवासी मुद्दों, जन आन्दोलनों, ग्राम सभा आन्दोलन इत्यादि से जुड़े हैं और किसी न किसी स्तर में अपने गांव, समुदाय या क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं। इन कार्यशालाओं में प्रतिभागियों की निर्धारित संख्या 20 रखी गई थी, पर कहीं-कहीं यह संख्या 30 से 35 भी थी। कोशिश यह भी थी कि इनमें महिला और पुरुष प्रतिभागियों की संख्या बराबर हो। इक्के-दुक्के कार्यशाला को छोड़ बाकी सभी कार्यशालाओं में महिला-पुरुष की भागीदारी समान रही। पूरे कार्यक्रम को संचालित करने के लिए एक प्रबंधन समिति बनी है जिसमें रमेश जेराई, जेवियर कुजूर और विनीत मुंडू हैं। इस कार्यक्रम को आगे भी करने का विचार है।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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