Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
जनजातीय विकास एवं वन अधिकार अधिनियम : राज्य स्तरीय कार्यशाला
झाड़खण्ड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, रांची में 28 जून, 2008 को कल्याण विभाग, झाड़खण्ड सरकार की ओर से “जनजातीय विकास एवं वन अधिकार अधिनियम” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का अयोजन किया गया। इस कार्यशाला में जेजेबीए के करीब 60 कार्यकर्ता भाग लिये।
संस्थान के उपनिदेशक श्री सोमा मुण्डा ने कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि लोगों को इस अधिनियम और इसके अधिकार के बारे में जानकारी हो। सरकारी संस्थान और गैर सरकारी संस्थान एक लक्ष्य के लिए एक साथ मिलकर काम करेंगे तो हमारा लक्ष्य जरूर पूरा होगा। यह अधिनियम किसी को लड़ाने के लिए नहीं बनी है, बल्कि समस्याओं के समाधान के लिए बनी है। इस अधिनियम में वन निवासियों की भी भूमिका है, अधिकार के साथ कत्र्तव्य भी हैं।
रांची के उपायुक्त के. के. सोन ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि विगत कुछ वर्षों में सामाजिक मुद्दों पर भार सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण कानून बनाये हैं- नरेगा, वनाधिकार, सूचनाधिकार इत्यादि। ये कानून सामाजिक आन्दोलन के परिणाम हैं। इन कानूनों को बनाने में कई संगठनों की भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि जब वनाधिकार कानून को लागू करने के लिये नियमावली बन रहा था तो उन्होंने आदिवासी कल्याण आयुक्त पद पर रहते हुए राज्य के सभी जिले के उपायुक्तों को इस कानून को लागू करने का नोटिस भेजा था। उन्होंने कहा कि जनवरी 2008 में जब से यह कानून लागू हुआ, तब से अब तक हमने इसे लागू करने के लिए जो काम किया या करने की कोशिश कर रहे हैं, उस पर विचार हो तथा इस तरह के कार्यशाला को निचले स्तर तक ले जाने की जरूरत है। इसके लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए। उन्होंने रांची में मात्र 700 दावा-पत्र जमा होेने पर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि रांची जिले में वनाधिकार कानून के मामले में जिला कल्याण पदाधिकारी को अधिकृत किया गया है। उन्होंने आश्वसन दिया कि वे वनाधिकार कानून पर सहयोग करेंगे। इसको लेकर रांची में हर महीने बैठक होगी। वन विभाग भी अब वनाधिकार को लागू करने में आएगा। उन्होंने कहा कि एग्रोफोरेस्टरी को बढ़ावा देना होगा। इसके तहत उनकी ओर से पेड़ लगाने से लेकर पटवन और पेड़ों की सुरक्षा तक के लिए पैसे दिये जा रहे हैं। उन्होंने यह भी बतलाया कि धारा-230 के तहत वन निवासियों के छोटे-मोटे मुकदमे वापस करने हेतु उपायुक्त को अधिकृत किया गया है।
प्रो. संजय बसु मल्लिक ने कहा कि पिछले 60 साल में वन विभाग ने झाड़खण्ड के जंगल को उजाड़ दिया। पिछले 60 सालों आदिवासी क्षेत्र में पंचशील का उल्लंघन ही हुआ तो विकास कैसे होगा? विकास के नाम पर उनका विस्थापन ही हुआ। संसांधनों पर आदिवासियों के अधिकार के बिना उनका विकास कैसे होगा? वनाधिकार कानून में दावेदारों को 10 एकड़ जमीन देने की बात है लेकिन 30-40 डिसमिल ही दिया जा रहा है। क्या इससे किसी परिवार का पेट भरेगा? इतना जमीन लेकर वह क्या करेगा? उन्होंने बतलाया कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध के कारण लकड़ी की मांग बढ़ने पर जमींदारों ने धड़ल्ले से जंगल काटकर लकड़ी बेचा। इस वन कटाई को रोकने के लिए ही अंग्रेजों ने बिहार वन अधिनियम बनाया था।
इज्जत से जीने का अभियान से जुड़े जोर्ज मनीपली ने कहा कि वनाधिकार कानून को लागू करने में झाड़खण्ड और अन्य राज्यों की स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं है। कुछ राज्यों में दावा-पत्र अधिक जरूर जमा किये गये हैं लेकिन 25 प्रतिशत लोगों को ही पट्टा मिला। उन्हें भी औसतन 25-30 डिसमिल ही हर परिवार को जमीन मिला। वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की समस्या पर उन्होंने कहा कि प्रशासन तंत्र के लोग इस कानून को लागू करने में ग्रामसभा को अधिकारी मानने को तैयार नहीं हैं। कही-कहीं गांव के लोग भी वन अधिकार समिति और ग्रामसभा पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। वे 50 से 100 रू. देकर प्रखण्ड कार्यालय में जाकर किसी चपरासी के पास अपना दावा-पत्र जमा करते हैं, लेकिन ग्रामसभा या वन अधिकार समिति के जमा करने में सोचते हैं। दूसरी बात है कि सरकार द्वार निर्मित दावा-पत्र जटिल है जिसे गांव वाले आम आदमी नहीं भर सकते। जो लोग किसी तरह दावा-पत्र भरकर ब्लाॅक आॅफिस में जमा करने जा रहे हैं, तो वहां के कर्मचारी दावा-पत्र जमा करने के लिए 400 रु. की मांग कर रहे हैं तथा पट्टा मिलने पर और 5 हजार रु. की मांग कर रहे हैं। उधर वन विभाग को अब यह लग रहा है कि आने वाले दिन जंगल से हमारा अधिकार जाने वाला है। वन विभाग के रवैये को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह कानून ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने के लिए बना है, पर ऐतिहासिक अन्याय को बरकरार रखने का प्रयास हो रहा है। सभी जिलों के उपायुक्तों को वनाधिकार कानून को लागू करने हेतु निर्देश देना था, पर कई जिलों में यह नहीं हो रहा है।
जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक डाॅ. प्रकाश उरांव बतलया कि झारखण्ड में अब तक कुल 30 हजार 16 दावा-पत्र जमा हुए जिसमें से 6 हजार 607 लोगों को पट्टा वितरण किया गया है। पूर्व आईएएस वाई. बी. प्रसाद ने कहा कि 10 दिन पहले भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है जिसमें ग्राम सभा में वनाधिकार समिति से वन विभाग को अलग रखा है। उन्होंने कहा कि वनाधिकार कानून की जानकारी बहुत कम लोगों को है। उन्होंने यह भी बतलाया कि अभी रिपोर्ट है कि जहां-जहां माओवाद है वहां जंगल कटाई रुका है तथा उन क्षेत्रों से लकड़ी व्यापार के ठेकेदार और दलाल भाग गये हैं। वन विभाग के सहायक सचिव आर. के. चैधरी ने कहा कि पहले के वन कानून या नीति और अभी के वनाधिकार कानून में कई विरोधाभास नजर आएंगे। राज्य में वनाधिकार कानून का क्रियान्चयन प्रारंभिक चरण है, धीरे-धीरे काम बढ़ेगा और उद्देश्य पूरा होगा।
राज्य सभा सांसद डाॅ. रामदयाल मुण्डा ने कहा कि इस कानून को पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में लागू करने में वांक्षित शक्ति नहीं है, ऐसा एक विचार है। आदिवासी मंत्रालय को इस कानून को लागू करने में नोडल एजेंसी बनाया गया है लेकिन यह मंत्रालय अभी नया गठित होने के कारण उसके सामने कठिनाई है। उन्होंने कहा कि वनाधिकार को लागू करने में जो आशंकाएं हैं, उनका निराकरण हो। कुछ लोगों को आशंका है कि आदिवासियों को जब जंगल पर अधिकार मिलेगा तो जंगल का हाल बेहाल हो जाएगा, जंगल क्षरण होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि वनाधिकार कानून के लागू होने से वन विभाग और वन निवासियों के बीच जो अविश्वास है, वह दूर होगा। कार्यशाला में प्रतिभागियों को चार गु्रप में बांटकर गु्रप चर्चा कराया गया जिसमें निम्न विषय थेः- 1. वन विभाग और वन निवासियों की भूमिका; 2. आजादी के 62 वर्ष बाद वननीति से क्या पाया, क्या खोया; 3. वनाधिकार कानून से जनजातीय विकास और लाभ; और 4. लघु वनोपज और जनजाति। इनपर ग्रुप चर्चा के बाद प्रस्तुति भी की गई। अंत में संस्थान के निदशक ने कहा कि कार्यशाला और ग्रुप चर्चा से उभरे बातों को वे सरकार को भेजेंगे।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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