Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
शिक्षा के अधिकार पर दो दिवसीय कार्यशाला
सबको शिक्षा समान शिक्षा: क्या हमारे राज्य में खरा उतर पायेगा
रांची स्थित गोसनर कम्पाउड एच.आर.डी.सी में 11 - 12 जून 2010 को प्रखण्ड प्रभारियों के नेतृत्व क्षमता को बढ़ाने के लिए शिक्षा अधिकार कानून 2009 पर दो दिवसीय कार्यशाला किया गया।
इस कार्यशाला में खासतौर पर 1 से 18 वर्ष तक के बच्चों के शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उनके शिक्षाधिकार पर मंथन किया गया। एक बात सामने निकलकर आयी कि शिक्षा को बाजार में बेचा जा रहा है अर्थात् शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया गया। एक तरफ सरकार सबको शिक्षा समान शिक्षा कह कर गरीब बच्चों को शिक्षित और साक्षर बनाने का आश्वसन देती है, लेकिन दूसरी तरफ इसके प्रबंधन के लिए सरकार निजी संस्थाओं को सौपी जा रही है। 26 अगस्त 2009 को देश के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार बना। इसमें 06 से 14 वर्ष के बच्चों को अधकार मिलेगा। सवाल है कि 14 वर्ष के ऊपर के बच्चों को अधिकार की बात क्यों नहीं?
झारखण्ड में गांव, शहर या कस्बों से इतना दूर है कि स्कूल बच्चों के पहुंच से दूर है। निजी स्कूलों में तो निर्धन बच्चे पढ़ नहीं पाते चूंकि वहां फीस ज्यादा देना पढ़ता है। जिन गांवों में सरकारी स्कूल है, निःशुल्क शिक्षा मिल सकता है वहां बच्चे बहुत ज्यादा (100) और शिक्षक 1 या 2 ही हैं तो उस स्कूल का पढ़ाई किस तरह का होगा। अगर दूर के अच्छे स्कूलों में जाना भी चाहते हैं तो आने-जाने के लिए साधन नहीं। बच्चे पढ़ेगे कैसे? इसलिए सरकार को चाहिए कि बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को सुदृढ़ करें, चूंकि भविष्य में राज्य और देश का विकास उन्हीं बच्चों पर निर्भर करता है।
स्कूली और पारंपरिक शिक्षा पर भी चर्चा हुई। इस चर्चा के दौरान कुछ बातें सामने आई- स्कूली शिक्षा में बच्चों को केवल पुस्तकीय ज्ञान ही हासिल होगा। हमारे बच्चों को परंपारिक ज्ञान का मिलना भी निहायत जरुरी है। आज हम अपने भाषा-संस्कृति, परंपारिक ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं। हम अपने इतिहास को नहीं जानते हैं। इन सारे अमूल्य रत्नों को बचाना बहुत जरुरी है, और इनको बचाने के लिए इन्हें पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराना होगा ताकि हमारे बच्चे अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान, इतिहास को जाने।
शिक्षा अधिकार पर नये-नये कानून बनाये गए और बीच-बीच में संशोधन भी हो रहा है। किन्तु इन कानूनों को जमीनीस्तर पर लागू नहीं किया गया। इसकी भी लड़ाई हम वर्षों से करते आ रहे हैं। ऐसे तो झारखण्डी अपने झारखण्ड के लिए सदियों से लड़ाई लड़ते आ रहे हैं और अभी भी जारी है। हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हमें अपने इच्छानुसार रहने नहीं दिया जाता। किन्तु अत्याधिक निर्धन बच्चों को अच्छा शिक्षा कैसा मिलेगा, क्योंकि कानून में प्रदत्त प्रावधान एवं अधिकार भी उन्हें सही से मिल नहीं पाता है, कहीं-कहीं तो शून्य है। अतः हमें ठोस कदम उठाना होगा, सरकार को ज्ञापन देना होगा। झारखण्ड की शिक्षा नीति में बदलाव लाने और शिक्षा के बजारीकरण को नियंत्रित करने के लिए सरकार पर दबाव डालना होगा।
शिक्षा का अधिकार कानून के आधार परः-
1. 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा।
2. निजी स्कूलों को 25 फीसदी स्थान गरीब और वंचित तबके के लिए आरक्षित रखेंगे।
3. शारीरिक और मानसिक विकलांग बच्चों को भी शिक्षा का पूरा अधिकार।
4. 30 बच्चों पर एक शिक्षक का अनुपात।
5. 5 वर्ष के भीतर निजी स्कूलों के सभी शिक्षकों को प्रशिक्षण लेना होगा।
6. सर्वेक्षण से पता लगाना होगा कि कौन से बच्चे स्कूल से बाहर हैं।
7. स्कूलों के ढांचे (पीने का पानी, शौचालय, स्वच्छता आदि) को दुरुस्त करना होगा।
8. स्कूलों में बच्चों को किसी भी तरह की सजा नहीं दी जा सकेगी।
इस कानून को लागू करने पर पांच सालों में 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। पहले ही साल इसके लिए 34 हजार करोड़ रुपये की जरुरत है, पर भारत सरकार ने केवल 15 हजार करोड़ रुपये का ही आवंटन किया है। तो क्या सबको शिक्षा और समान शिक्षा वाली बात देश या राज्य में खरा उतर पायेगा?
दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्यतः क्राई के श्री साईबाल बोरोई, प्रो. संजय बसु मल्लिक, सुश्री पुष्पा टोप्पो, जनमाध्यम से श्री फैसल अनुराग, प्रवीण कुमार और जेजेबीए के करीब 50 प्रखण्ड प्रभारीगण प्रतिभागी के रुप में उपस्थित थे।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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