Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
एफडीए फंड से वनाधिकार आंदोलन को तोड़ने का प्रयास : राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच की क्षेत्रीय बैठक
25 जून, 2010 को रांची के एचआरडीसी सभागार में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन और राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच के तत्वावधान में पूर्वी क्षेत्रीय मीटिंग आयोजित की गई। इसमें पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और उड़ीसा के 21 प्रतिभागी भाग लिये। बैठक में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की वर्तमान स्थिति और भावी कार्यक्रमों पर चर्चा हुई।
मंच के क्षेत्रीय समिति के संयोजक जेवियर कुजूर ने पिछले राष्ट्रीय मीटिंग की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि पिछले जनवरी में हुए मीटिंग में वनाधिकार कानून को पूरे देश में लागू कराने और सामुदायिक वन पालन को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का निर्णय था। साथ ही जलवायु परिवर्तन और वनों के बाजारीकरण को रोकने तथा जन आन्दोलन पर पुलिस व सैन्य दमन को रोकने का भी निर्णय लिया गया था।
रिपोर्टिंग के बाद दिल्ली से आयी राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच की ममता दास ने मंच के क्षेत्रीय कमेटी के गठन के उद्देश्यों को बतलया जो निम्नलिखित हैं:- 1. पूर्वी भारत के चार राज्यों असम, बंगाल, झाड़खण्ड और उड़ीसा में आपसी तालमेल और समन्वय अच्छा बने; 2. वनाधिकार को लागू करने में इन राज्यों के संगठन एक-दूसरे को मदद कर सकें; 3. चारों राज्यों के वनाधिकार आन्दोलन में एक नेटवर्क बने; 4. चारों राज्यों के आन्दोलन के बारे में एक-दूसरे को खबर हो; 5. राष्ट्रीय स्तर के आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका हो और इन राज्यों के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उभरे; और 6. व्यपाक राष्ट्रीय स्तर के आन्दोलन के लिए क्षेत्रीय समितियों को मजबूत करना।
इसके बाद प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में वनाधिकार कानून को लागू करने के संबंध में जानकारियों को साझा किया। इस दौरान उत्तर बंगाल के शंकर क्षेत्री ने बतलाया कि इस वर्ष जलपाईगुड़ी जिले के कोदालबस्ती चिलापाटा फोरेस्ट में जंगल पर सामुदायिक अधिकार को लागू करने के लिए ग्राम सभा द्वारा साइनबोर्ड लगाये थे, लेकिन पुलिस उसे उखाड़कर ले गयी और पुलिस ने गांव के कुछ लोगों पर केस भी कर दिया है। वन श्रमजीवी मंच के लोगों ने उनका जमानत करा लिया है। इस घटना के समय से महिलाएं और बच्चे भी संघर्ष के साथ जुड़े हैं। गोरखा जन मुक्ति आन्दोलन के चलते हमें काम करने में मुश्किल हो रहा है। आदिवासी अधिकार मंच की झरना आचार्य ने बतलाया कि सरकारी आधार पर प. बंगाल में अब तक 22 हजार लोगों को पट्टा मिला है, जबकि 1 लाख 42 हजार 782 दावा-पत्र जमा हुए थे। लोधा समुदाय के लोगों को जो पट्टा मिला, उनमें अधिकतर को 22 डिसमिल जमीन मिला। उन्होंने बतलया कि दक्षिण बंगाल में ग्रीन हंट आॅपरेशन के कारण लोग गांव से भाग गये हैं। अतः वनाधिकार को लेकर उनकी मीटिंग करने में दिक्कत हो रहा है। अभी क्षेत्र के 7 गावों में सामुदायिक दावा-पत्र भरने का निर्णय लिया गया है। साथ ही सामुदायिक वन संसाधन का साईनबोर्ड लगाने का निर्णय है। वनाधिकार को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दर्ज की गई है। गोविंद रोका ने कहा कि वन विभाग एफडीए फंड देकर आन्दोलन को कमजोर कर रहा है, उसे रोका चाहिए।
जंगल सुरक्षा महासंघ, उड़ीसा के कैलाशचंद्र साहू ने बतलया कि राज्य के ग्यारह जिले के 245 गांवों ने सामुदायिक वन अधिकार का दावा-पत्र पेश किया है। नोयागड़ा जिले में 1956 से ही समुदाय की पहल से जंगल सुरक्षा शुरू हुआ और 1970 में इसमें तेजी आयी। इसमें सरकार की पहल नहीं थी। लेकिन अभी वन विभाग के लोग अपने द्वारा गठित वन सुरक्षा समिति को फोरेस्ट डेवलोपमेंट एजेंसी द्वारा फंड देकर संयुक्त वन प्रबंधन को ही लागू करने में लगे हैं। उन्होंने बतलाया कि सरकार सामुदायिक वन प्रबंधन को मान्यता नहीं दे रही है। अभी उड़ीसा में 12-15 गांवों में वनप्रबंधन का काम चल रहा है तथा उड़ीसा जंगल मंच के नाम से एक राजस्तरीय मंच भी बना है। झाड़खण्ड के प्रतिनिधियों ने बतलया कि सरकारी आंकड़ा के मुताबिक राज्य में अब तक करीब 4 हजार लोगांे को पट्टा मिला जबकि 27 हजार दावा-पत्र जमा हुए।
बैठक में निम्न प्रस्ताव लिये गयेः-
1. समुचित तरीके से सामुदायिक दावा-पत्र भरकर जमा करना;
2. सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन हेतु जंगल में साइनबोर्ड लगाना;
3. वनाधिकार के क्रियान्वयन से संबंधित केस स्टडी और जमीनी स्तर के आंकड़ों का दस्तावेजीकरण करना ताकि वन विभाग पर मुकदमा और कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज किया जा सके, और
4. जरूरी दस्तावेज, पुस्तिका और पोस्टर छापकर जनता तक पहुंचाना।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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