Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
वनमापन प्रशिक्षण : जंगल और जनता को बचाने के लिए जीपीएस का उपयोग हो
जेजेबीए द्वारा सराईकेला जिले के कुचाई प्रखण्ड अंतर्गत सोसोकड़ा गांव में जीपीएस मशीन से वन मापन का प्रशिक्षण चलाया गया। इस दौरान मुख्यतः तीन चीजों के बारे प्रशिक्षण दिया गयाः- जीपीएस, जीआईएस और पार्टिसिपेटरी 3-डी माॅडल। यह प्रशिक्षण 30 मार्च से 10 अप्रैल, 2010 तक चला जिसमें कुल 16 प्रतिनिधिनियों ने भाग लिया। ये प्रतिनिधि जंगल पर जनता के अधिकार को लेकर काम करने वाले संगठनों से थे। पश्चिम बंगाल से राष्ट्रीय वन जन श्रम जीवि मंच, डिवोट ट्रस्ट, परिवर्तन, सेवा जगत (तीनों उड़ीसा), छत्तीसगढ़ से परिवर्तन और झारखण्ड से झाड़खण्ड जंगल बचाओ आन्दोलन के प्रतिभागी शामिल हुए।
वन मापन प्रशिक्षण के दौरान रोज दिन फील्ड वर्क और जीपीएस प्रैक्टिस के बाद सैद्धांतिक क्लास भी होता था। इस दौरान प्रो. सबीनो पडीला और सुभाष दत्ता द्वारा वनमापन और जीपीएस के प्रयोग हेतु जरूरी बातों को बतलाते थे। इसमें वन मापन के तरीके और जीपीएस प्रयोग के तकनीक एवं नियम को समझाया जाता था। प्रो. सबीनो ने जीपीएस और जीआइएस के प्रयोग और उनके फायदे के बारे बतलया। जबकि दत्ता ने जंगल मापन के लिए जंगल को चार प्रकार का वर्गीकरण करते हुए घना जंगल, खुला जंगल, बेयर लैंड (खाली जगह या आवास या खेती जमीन) और प्लांटेशन (रोपे गये पेड़ या बगीचे) के बारे समझाया। जीपीएस को लेकर विभिन्न स्थानों से गुजरते समय महत्वपूण स्थानों और चीजों का मार्क प्वाइंट एवं नोट लेने के बारे उन्होंने बतलया। उन्होंने सर्वे के दौरान रिलेस्कोप के प्रयोग के बारे भी समझाया कि कैसे प्लोटिंग लिया जाता है, घना जंगल और खुला जंगल का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है तथा जंगल का क्षेत्रफल, घनत्व और पेड़ों की संख्या एवं प्रजाति कैसे निकाली जाती है।
30 मार्च को सभी प्रशिक्षणार्थी जेजेबीए आॅफिस रांची में एकत्रित हुए। उस दिन प्रशिक्षणार्थियों के बीच वन मापन के ऐतिहासिक पृष्टभूमि पर चर्चा की गई। इस दौरान जेजेबीए के संजय बसु मल्लिक ने बतलाया कि राज्यों के उदय के बाद ही पहली बार जमीन का नक्शा बनाने का काम शुरू हुआ। भारत में मुगल काल में अकबर के शासन के समय समुचित तरीके से नक्शा बनाने का काम शुरू हुआ। मुगलों ने जब झाड़खण्ड में जंगल का सर्वे और नापी किया तो उसमें उन्होंने खास तौर से सखुआ के पेड़ और हाथियों को दर्ज किया। राजाओं और सम्राटों ने संसाधनों के दोहन के लिए नक्शा बनाना शुरू किया। लेकिन गांव समुदाय को अपना नक्शा इसलिए बनाना चाहिए क्योंकि नक्शा एक ताकतवर औजार है। नक्शा अपने गांव की सीमा में उपलब्ध संसाधनों की सूचना एवं जानकारी देता है। अपना नक्शा होने से गांव के लोग अपने स्थानीय संसाधनों पर हक जता सकते हैं।
29 मार्च को ही रांची से खाने-पीने और सोने के सामानों- चावल-दाल, बर्तन, बाल्टी, कपड़े, गद्दे इत्यादि और प्रशिक्षण सामग्री को एक बोलेरो वैन में लाद कर प्रशिक्षण स्थल पहुंचाया गया था। 31 मार्च को 11 बजे सभी प्रतिभागी 2 गाड़ियों में सवार होकर कुचाई के लिए रवाना हुए और शाम के करीब 4 बजे रुगुदडीह पहुंचे जहां रहने-ठहरने की व्यवस्था थी। शाम को मीटिंग शुरू हुई जिसमें प्रतिभागियों का परिचय हुआ। इस दौरान रुगुदडीह के मुण्डा भागवत मुण्डा ने बतलाया कि इस क्षेत्र में 39 मौजा है जो मुण्डारी खुंटकट्टी है और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के तहत मुण्डाओं के कब्जे में है। उन्होंने इस प्रशिक्षण के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने के लिए आशीर्वाद दिया। इसके बाद मीटिंग में प्रशिक्षण के दौरान सुबह से शाम तक दैनिक रुटीन पर विचार किया गया।
वन मापन के इस प्रशिक्षण में विशेषज्ञ और स्रोत व्यक्ति के रूप में फिलीपीन्स से आये प्रो. सबीनो ने बतलाया कि जीपीएस से वन मापन प्रशिक्षण में कम से कम 12 दिन लग जाते हैं। इस अवधि में जीपीएस (ग्लोबल पोजिश्निंग सिस्टम), जीआईएस (ग्लोबल इन्फोर्मेशन सिस्टम), बेस मैप और पार्टिसिपेटरी 3-डी माॅडल के सिखलाया जाता है। उन्होंने बतलाया कि जीपीएस का उपयोग मिलिट्री या फौज और कंपनी द्वारा किया जाता रहा है, अब हमें जंगल और जनता को बचाने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए। सबीनो ने 3-डी माॅडल नक्शे के लिए आवश्यक सामग्रियों की सूची बतलाया। इसके बाद इन सारे सामानों को एक जगह एकत्रित किया गया; जैसे- कार्डबोर्ड, कटर, क्लिप, कार्बन कागज, माप टेप, गोंद, मार्कर, कैंची, प्लास्टिक टेप, धागा, पेन्सिल, पेन्टिग ब्रस, पेंट, रंग, पिन, बेस मैप, टेबल, हथौड़ा और रद्दी समाचारपत्र कागज। इस प्रशिक्षण के लिए 6 जीपीएस थे। इनमें दो तरह के जीपीएस- ओरिगोन-550 और गारमिन-12 थे। जीपीएस मोबाइल के आकार का एक ऐसा इलेक्ट्राॅनिक डिजिटल यंत्र है जिससे सर्वे करने और नक्शा बनाने का काम होता है। जीपीएस का पूरा नाम है ग्लोबल पोजिश्निंग सिस्टम। ग्लोबल पोजिश्निंग आक्षांश-देशांतर के आधार पर किसी स्थान विशेष की वास्तविक भौगोलिक अवस्थिति को बतलाता है और समुद्रतल से उंचाई को भी दर्शाता है।
1 अप्रैल को सुबह नास्ता के बाद सभी प्रतिभागी 8 बजे सोसोकड़ा गांव पहुंचे। गांव वालों ने दो खटिया निकाल दिया। अखड़ा के पास खटिया में सभी प्रतिभागी दो समूहों में बैठ गये। दोनों समूह के लिए दो-दो जीपीएस दिया गया। कोलकाता से आये सुभाष दत्ता और प्रो. सबीनो प्रशिक्षक के बतौर एक-एक समूह के साथ बैठ गये। सबसे पहले उन्होंने जीपीएस से परिचय कराया। जीपीएस को चालू करने और बंद करने तथा बैटरी लगाने के लिए सिखाया। उसके बाद जीपीएस को चालू करने के बाद उन्होंने अक्षांश-देशान्तर और ग्लोबल पोजिश्निंग के बारे बतलाया। फिर अलग-अलग मेनू में जाकर जीपीएस को आॅपरेट करने सिखाया। फिर उन्होंने ‘वे प्वाइंट’ और ‘मार्क प्वाइंट’ लेने के लिए सिखाया। प्रशिक्षणार्थियों ने इसका अभ्यास भी किया।
2 अप्रैल को गाड़ी में तेल भरने के लिए खरसवां गये थे। 3 अप्रैल को सोसोकड़ा गांव के जंगल के सर्वे के लिए सुबह 8 बजे नास्ता के बाद सोसोकड़ा गांव पहंुंचे। सर्वे करने की जिम्मेदारी सुभाष दत्ता को था। उनका स्पष्ट निर्देश था कि सर्वे टीम में वही व्यक्ति शामिल रहेंगे जो जंगल-झाड़ घूम सकते हैं, पहाड़ चढ़ सकते हैं। कठिन स्थिति को देखते हुए इसमें महिला प्रशिक्षणार्थी शामिल नहीं हुए। सर्वे टीम के प्रशिक्षणार्थी 10 बजे वहां के ग्रामीणों के साथ जंगल की ओर रवाना हुए। गांव के पूर्वी सिमाना से जीपीएस मशीन से ‘वे प्वाइंट’ लेकर बाउंडरी लाइन से होते हुए पहाड़ चढ़ना शुरू किये। कुछ लोग तो आधा दूरी तक पहाड़ चढ़कर वापस लौट गये। बाकी लोग कड़ी धूप और गर्मी में पसीने से तर होकर पहाड़ चढ़ते गये। पहाड़ की चोटी पर चढ़ने के बाद तिनसिमाना में ‘मार्क प्वाइंट’ लिया गया। इस पहाड़ की चोटी को सुरसी बुरू कहा जाता है जो 580 मीटर उंचाई पर है। वहां से आगे बढ़े। गांव के बुजुर्ग लोग अपने जंगल के बाउंडरी लाइन से होकर आगे-आगे चलते थे। उनके पीछे प्रशिक्षणार्थी जीपीएस मशीन को चालू करके हाथ में पकड़कर चलते जाते थे। दत्ता जी जंगल के घनत्व का अवलोकन करते हुए जगह-जगह पर जंगल के बीच घुसकर रिलेस्कोप मशीन से प्लोटिंग करते जाते थे। 12-1 बजे तक जंगल पहाड़ में घूमते हुए सभी कोई धूप की मार और प्यास से व्याकुल थे। बोतलों में भरे पानी भी पीते-पीते खत्म हो गया था। जंगल के दूसरे छोर पर पहुंचने पर एक झरने में उतरकर सभी ने ठंढा पानी पीया और बोतलों में पानी भरकर वहां से वापस सोसोकड़ा लौट गये। करीब साढ़े तीन बज गये थे। सभी कोई भूख-प्यास और थकान से चूर थे। सोसोकड़ा में भोजन करने के बाद सर्वे टीम रुगुडीह लौट गयी।
4 अप्रैल को सोसोकड़ा से पश्चिम की ओर चले। उधर बीजार गांव का सिमाना पड़ता है। सोसोकड़ा और बीजार सीमाना अलग करने वाले पहाड़ों की तीन चोटियों पर चढ़ना पड़ा। इसमें कुटुबुरू 450 मीटर और किताबुरू की उंचाई समुद्र तल से 454 मीटर है। उस गांव की सीमा को निर्धारित करने वाले जंगलो-पहाड़ों से गुजरते हुए तीन बजे सोसोकड़ा वापस लौट गये। वहां भोजन करके रुगुडीह आ गये।
5, 6 और 7 अप्रैल को 3-डी माॅडल नक्शा बनाकर तैयार किया गया। इसे कार्ड बोर्ड और कूट से बनाया गया। कूट के ऊपर कार्बन कागज और उसके ऊपर बेस मैप को रखकर पेन्सिल से निशान लगाया गया। उसके बाद कूट को कन्टूर के आधार पर काट-काटकर कार्डबोर्ड पर सांटा गया। फिर उसे अखबारी कागज से चिपकाकर पेंटिंग कर दिया गया। उस पर घना जंगल, खुला जंगल, नदी-नाला और पहाड़, गांव, खेत, सड़क, स्कूल, आंगनबाड़ी केन्द्र, अखड़ा, सरना, मसना, ससनदिरि, चापाकल, कुआं इत्यादि को अलग-अलग रंगों से दिखाया गया। इस तरह काफी मेहनत और लगन से 3-डी माॅडल बनकर तैयार हुआ। 8 अपैल को सोसोकड़ा मौजा गांव और सिगदा टोला का सर्वे हुआ जिसमें सरना, ससनदिरि, स्कूल, कुआं, चापाकल, तालाब, नदी-नाला इत्यादि का सर्वे किया गया। सिगदा टोले में प्रो. सबीनो, पुष्पा टोप्पो आदि गये हुए थे। 9 अप्रैल को सोसोकोड़ा के ग्रामीणों को बुलाकर 3-डी माॅडल को दिखलाया गया और साथ प्रतिभागियों का सामुहिक फोटोग्राफी किया गया।
10 अप्रैल को सभी रांची वापस लौट गये। 11 से 14 अप्रैल जेजेबीए आॅफिस रांची में प्रो. सबीनो ने ग्लोबल मैपर, जीआइएस, आर्कव्यू आदि सोप्टवेयर के माध्यम से डाटा प्रोसेसिंग करके कंप्यूटर से नक्शा तैयार करने के बारे प्रशिक्षण दिया। अंत में सभी प्रशिक्षणार्थियों को आईसीएफजी की ओर से वन मापन टेªनिंग का प्रमाण-पत्र दिया गया गया। प्रशिक्षण मंे संजय बसु मल्लिक, जेवियर कुजूर, पुष्पा टोप्पो, सूर्यमनी भगत, विजय भगत, जेवियर हमसाय, हेमंत मिंज, प्रदीप बिलुंग, सनिका टूटी, अमिता टूटी, सोहन लाल, सरत पात्रा, विष्णु मांझी, प्रसन्न दास, रमाकांत रावत और सौरभ ने भाग लिया। प्रशिक्षण तो सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया, किन्तु उसके बाद उनमें से 10 साथी बे्रन मलेरिया से पीड़ित हो गये थे। सभी को हाॅस्पिटल में भर्ती कर इलाज कराया गया।
When walking through a warm and lush forest setting one's thoughts can easily take flights of fancy. It is not difficult to shed the layers of modern life and find one's more subtle or primitive beginnings. Somewhere from deep within the spirit and majesty of each single tree steps forth and at once one can find themselves transported to a world of shadow and shade. - Morgan La Fey
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