Forests were the first temples of the Divinity, and it is in the forests that men have grasped the first idea of architecture. - Francois-Rene de Chateaubriand,1802
FRA 2006
वन अधिकार अधिनियम, २००६
संघर्ष का एक हथियार
भारतीय संसद में पारित अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यत) अधिनियम २००६ देश के आदिवासियों और अन्य वन निवासियों के कठिन एवं दीर्घकालिक संघर्ष में एक युगांतरकारी घटना है। भारतीय वनों के इतिहास में पहली बार राज्य ने औपचारिक तौर पर से यह स्वीकार किया कि लम्बे समय तक वनों में रहने वालों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है, और नया वन अधिनियम न सिर्फ उस ’ऐतिहासिक अन्याय‘ को दूर करने की कोशिश करता है बल्कि वन प्रबंधन में वन समुदायों की भूमिका को प्रमुखता भी देता है।
यह अधिनियम कैसे बना ? राज्य ने हमेशा ’सर्वोपरि अधिकार‘ के सिद्धांत (इसका मतलब है कि राज्य सभी प्राकृतिक संसाधनों का मालिक है और उन पर जनता का कोई मालिकाना हक नहीं है) का सख्ती से पालन किया और वन जनों की न्यायोचित माँगों की उपेक्षा की। वही राज्य आज क्योंकर जनाधिकारों के प्रति संवेदनशील हो गया है ? क्यों उसने यह बात मान ली कि वनों पर लोगों के कुछ अधिकार हैं ? जबकि १८५० ई. के बाद उपनिवेशकारों द्वारा वनों पर कब्जा कर लिये जाने के समय से अब तक जितनी भी नीतियाँ और कानून बने, उनका उद्देश्य वन जनों को जंगलों से बाहर निकाल देना ही था- पहले जंगलों को व्यावसायिक रूप से उत्पादक बनाने के लिए और बाद में वन्य जीवों की रक्षा करने के लिए।
अधिनियम कौन-सी नयी बातें कहता है ? ठीक-ठीक ’कैसे‘ वे बातें कही गयी है ? भारत के जो करोडों वंचित और शोषित वन जन आज भी वन एवं वन्य जीव संरक्षण और विकास परियोजनाओं की सुविधा के लिए अपने घरों और जमीनों से बर्बरतापूर्वक बेदखल किये जा रहे हैं, उनके लिए इस अधिनियम का वास्तव में क्या महत्व है ?
हमें, इस देश के वन आंदोलनों को, जो कई वर्षों से एक नया वन कानून बनाने की माँग कर रहे ह और उसके लिए अभियान चला रहे हैं, किस रूप में इस अधिनियम को देखना चाहिए जो उनके प्रयासों से संयुक्त संसदीय कमिटी द्वारा बनाये गये अधिनियम की एक छाया मात्र है? क्या हम इसे अपूर्ण और नाकाफी तथा राज्य द्वारा विश्वासघात मानते हुए सीधे ठुकरा दें? क्या हम इसे संदेह और अविश्वास की नजरों से देखते हैं क्योंकि राजनैतिक दलों और विश्व बैंक ने इसका समर्थन किया है, और क्या भारतीय वनों के निजीकरण के लिए छद्म रूप से किया जा रहा एक प्रयास मान कर इसे ठुकरा दें?
इसके विकल्प में, क्या हम एक सकारात्मक रवैया अपनायें और देखें कि कैसे यह अधिनियम हमारे संघर्ष के लिए फायदेमंद हो सकता है और उसे जोरदार बनाकर आगे ले जा सकता है?
ये कुछ प्रश्न हैं जिन पर हमें अपने खुद के संगठनों में, वनों में समुदायों के साथ और आपस में चर्चा करने की जरूरत है। हो सकता है कि यह छोटी-सी पुस्तिका इन प्रश्नों का उत्तर हमें न दे, क्योंकि भारत में वनों पर नियंत्रण के प्रश्न को तय करने वाली राजनैतिक प्रक्रिया की रूपरेखा अभी-अभी उभर रही है। वक्त और हमारे संघर्षों की प्रक्रिया से कई बातें और भी स्पष्ट होंगी। यहाँ हमने सिर्फ अभी उपलब्ध रूप में अधिनियम को पेश किया है। हम देखें कि हम कैसे जमीन पर अपनेसंघर्षों के संदर्भ और हित में इसकी धाराओं की व्याख्या कर सकते हैं।
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Forest Rights ACT 2006 (76)
... every tree near our house had a name of its own and a special identity. This was the beginning of my love for natural things, for earth and sky, for roads and fields and woods, for trees and grass and flowers; a love which has been second only to my sense of enduring kinship with birds and animals, and all inarticulate creatures.